पटवारी ने खुद को कमलनाथ के पैरों की धूल कहा; सिंधिया समर्थक राजपूत बोले- यह तो सिर्फ शुरुआत, बढ़ेगी जंग

भोपाल   मध्यप्रदेश कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। बजट सत्र में राज्यपाल मंगुभाई पटेल के अभिभाषण का बहिष्कार कर पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी अलग-थलग पड़ चुके हैं। कमलनाथ साफ कर चुके हैं कि उनके इस फैसले से पार्टी का लेना-देना नहीं। सदन की गरिमा जरूरी है। कमलनाथ पर पलटवार करते हुए पटवारी ने कहा था- सदन चलेगी तब तो गरिमा रहेगी न…। कांग्रेस के इस झगड़े में अब BJP भी कूद गई है।

कांग्रेस छोड़ BJP में शामिल हुए परिवहन मंत्री गोविंद सिहं राजपूत ने मीडिया से चर्चा करते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। सिंधिया समर्थक राजपूत ने कहा- इनकी गुटबाजी सड़क के बाद अब विधानसभा में देखने को मिल रही है। कांग्रेस की जंग और बढ़ेगी। कांग्रेस में जंग की शुरुआत हो चुकी है।

सत्र के दूसरे दिन विधानसभा पहुंचे पटवारी

जीतू पटवारी विधानसभा बजट सत्र के दूसरे दिन शामिल हुए। हालांकि, सदन स्थगित हो गया। मीडिया से बात करते हुए पटवारी ने कहा- मेरे नेता जो चाहते हैं, वो मुझे करना चाहिए। मेरे नेता कहते हैं कि सदन की गरिमा को रखकर सरकार को क्रिटिसाइज करना है तो उनके अनुभव को कोई चुनौती नहीं दे सकता। मेरी तो हस्ती ही नहीं है और मैं तो उनकी पैरों की धूल हूं। मैं मानता हूं कि कमलनाथ जी जैसे अनुभवी व्यक्ति जो कहते हैं, उसको सबको आत्मसात करना चाहिए। कमलनाथ जी ने जो कहा है उसका अक्षरश: पालन करूंगा।

13 बार पहले भी अभिभाषण का विरोध हो चुका

पटवारी ने कहा- संवैधानिक दृष्टि से राज्यपाल के अभिभाषण का सवाल है, तो मुझसे पहले 13 बार इस सदन में अलग-अलग तरीके से अभिभाषण का विरोध हुआ है। 29 जनवरी 2021 में 18 पार्टियों ने एक साथ देश की संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार किया है। लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार है अपनी बात कहने का। कल जो मैंने बात कही थी, वह सदन के बाहर की थी। आज मैं कहता हूं कि कमलनाथ जी मेरे नेता है। हम सब मिलकर भारतीय जनता पार्टी का चेहरा बेनकाब करेंगे। कमलनाथ जी के नेतृत्व में ही सरकार बनाएंगे।

दो साल में हर विधायक को ढाई से तीन मिनट का समय मिला

पटवारी बोले- भारत में मप्र बलात्कार में नंबर वन है। महिला आदिवासियों के अपहरण में नंबर वन है। बच्चियों पर अत्याचार होने के मामले में नंबर वन है। बेटियों की हत्या में नंबर वन है। ऐसे ही तमाम मुद्दे हम ढाई मिनट में नहीं उठा सकते। दो साल में सदन 82 घंटे काम हुआ है। हर विधायक को औसत ढाई से तीन मिनिट का समय मिला। यह संसदीय परंपरा के लिए संक्रमण है। विधायक नए तरीके खोजेगा और नए तरीके से सरकारी की आंख खोलेगा।

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