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हरियाणा में IAS-IPS के अहम की लड़ाई में बड़ा सवाल- ट्रेनिंग एक संग तो समान काम पर विवाद क्‍यों

चंडीगढ़। आइएएस अधिकारी हों या फिर आइपीएस अधिकारी, दोनों की शुरुआती ट्रेनिंग मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी आफ एडमिनिस्ट्रेशन में होती है। दोनों कैडर के अधिकारी वहां समान रूप से पुलिस एवं प्रशासनिक क्षमता के गुर सीखते हैं। फिर दोनों एक दूसरे के पदों पर काम क्यों नहीं कर सकते? किसी भी राज्य सरकार को यदि लगता है कि आइएएस कैडर के पद पर आइपीएस अधिकारी और आइपीएस कैडर के पद पर आइएएस अधिकारी बेहतरीन काम कर सकता है तो फिर इसमें किसी को क्या हर्ज हो सकता है? यह बडा सवाल हरियाणा के आइएएस और आइपीएस लॉगी के बीच छि़ड़े विवाद में उठाए जा रहे हैं।

 हरियाणा में आइएएस और आइपीएस लाबी के बीच इसलिए चल रही अहम की लड़ाई

इस सवाल पर राष्ट्रव्यापी बहस का विषय हो सकता है। सबके अपने-अपने तर्क होंगे, लेकिन जानकारों का कहना है कि यदि हरियाणा सरकार अपने प्रदेश की प्रशासनिक कार्यक्षमता में बढ़ोतरी, अफसरशाही की मनमानी रोकने और भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कोई प्रयोग करती है तो इसे जनहित में ही माना जाना चाहिए। हरियाणा में आइएएस और आइपीएस के साथ-साथ एचसीएस व एचपीएस लाबी में टकराव चरम पर पहुंच चुका है। इसकी वजह यही है कि सरकार आइएएस कैडर के पदों पर आइपीएस अधिकारियों से और एचसीएस काडर के पदों पर एचसीएस अधिकारियों से काम लेने लगी है।

अफसरशाही को लेकर नए प्रयोग कर रही मनोहर सरकार अफसरों के विवाद से विचलित नहीं

इस बात की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सरकार जिलों में आइपीएस अधिकारियों को डीसी लगाने लगे। यदि ऐसा हुआ तो आइपीएस अधिकारी जिलों में आइएएस अफसरों के बास होंगे। एक कैडर के पद पर दूसरे कैडर के अधिकारियों की नियुक्तियां कोई नया मामला नहीं है। हरियाणा से पहले मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों में यह प्रयोग हुए हैैं। कुछ केस सुप्रीम कोर्ट तथा केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्रालय में भी पहुंचे हैैं, लेकिन ज्यादातर केस में हुआ वही, जो सरकार ने चाहा।

हरियाणा में करीब एक दर्जन आइपीएस और एचपीएस अधिकारी ऐसे हैैं, जिन्हें आइएएस और एचसीएस कैडर के पदों पर नियुक्त किया गया है। ऐसी नियुक्तियां कई बार मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर करती हैैं। मुख्यमंत्री के पास कई स्रोत से ऐसी जानकारियां पहुंचती हैैं, जिनके आधार पर दावे से कहा जा सकता है कि फाइलों को लंबा खींचना, उन्हें गलत मंशा से लटकाना और काम न करने की नीयत से ऐसी फाइलों पर जानबूझकर अनावश्यक नोटिंग करते हुए इधर से उधर भेजना आइएएस अधिकारियों की आदत बन गई है।

अहम पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पसंद पर भी निर्भर करती है। ऐसे में राेचक सवाल यह है कि हरियाणा में शुरू हुआ आइएएस, आइपीएस, एचसीएस और एचपीएस अधिकारियों के बीच शुरू हुए टकराव का अंत क्या होगा? इसका जवाब तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन सरकार को इस विवाद पर अपने फैसले से पीछे हटने का मूड बनाना पड़ेगा, इसकी संभावना कतई नजर नहीं आ रही है।

इन अधिकारियों की नियुक्तियों से बढ़ी अफसरों में लाबिंग

मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनाती के समय सीनियर आइपीएस अधिकारी ओपी सिंह को जब खेल विभाग का प्रधान सचिव बनाया गया था, तब भी खेमका ने ही मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी थी। अब मनोहर सरकार के कार्यकाल में आइपीएस अधिकारी शत्रुजीत कपूर को परिवहन विभाग का प्रधान सचिव नियुक्त किया गया है, जबकि इससे पहले वह कई साल तक बिजली निगमों के चेयरमैन रहे हैं। इसी तरह से हरियाणा लोक सेवा आयोग के चेयरमैन के पद पर आइ एफएस अधिकारी आलोक वर्मा की नियुक्ति हुई है, जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय में आइआरएस अधिकारी योगेंद्र चौधरी सरकारी योजनाओं के नोडल अधिकारी के तौर पर तैनात हैं।

इसलिए चिंतित है हरियाणा की आइएएस लाबी

मुख्यमंत्री ने यह प्रयोग हालांकि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए किया है। उन्होंने परिवहन विभाग में ही एचसीएस काडर के पदों पर एचपीएस अधिकारियों की भी नियुक्तियां की, जिसका एचसीएस आफिसर्स एसोसिएशन ने खुला विरोध किया। अब आइएएस और एचसीएस लाबी को यह खतरा है कि कहीं जिला उपायुक्तों व एसडीएम के पदों पर आइपीएस व एचपीएस अधिकारियों को न बैठा दिया जाए। पालिसी मैटर के हिसाब से यह हालांकि सरकार का अपना फैसला हो सकता है और संभव है कि इसके परिणाम भी सरकार के मनमाफिक आएं, लेकिन अफसरशाही में इस समय पूरी तरह से हलचल मची हुई है।

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