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क्या हैं विक्रम संवत 2073 का इतिहास | Vikram Samvat hory in hindi

Vikram Samvat 2073 in hindi विक्रम संवत क्या है विक्रम संवत 2073 का इतिहास Vikram Samvat hory in hindi

विक्रम संवत सनातन धर्म में पालन किया जाने वाला वर्ष है. ये 57 ई. पू. से शुरू हुआ था. विक्रम संवत का कैलेंडर ग्रेगरी कैलेंडर से 57 साल पहले शुरू हुआ. सन 2017 विक्रम संवत् 2073 है. आज-कल के कई तरह के कैलेंडर विक्रम संवत के कैलेंडर से प्रभावित होते हैं. ज्योतिषी में भी विक्रम संवत के कैलेंडर से ख़ूब सहायता मिलती है. विक्रम संवत के आरम्भ में महाराजा विक्रमादित्य की वीर गाथा है. महाराजा विक्रमादित्य ने भारतवर्ष से शकों के राजाओं को खदेड़ कर भगाया था, जिससे उज्जैन में हिन्दूत्व का बोल बाला बढ़ा था. शकों पर इस विजय के उपलक्ष्य पर महाराजा विक्रमादित्य को “शकारि” की उपाधि मिली थी, और साथ ही इस घटना की याद में विक्रम संवत का वर्ष शुरू हुआ.

विक्रम संवत क्या हैं इतिहास बताये (vikram samvat hory in hindi)

इस घटना की कहानी महेसरा सूरी नाम के एक साधू से सुनी गयी थी. उनके अनुसार उज्जैन के बहुत शक्तिशाली राजा “गर्दाभिल्ला” ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके एक सन्यासिनी का अपहरण कर लिया था, जिसका नाम सरस्वती था, जो एक साधू की बहन थी. वह साधू एक शक राजा के पास अपनी बहन की जान की फ़रियाद लेकर गया, शक राजा ने उस साधू की बात सुनी और गर्धभिल्ला के ख़िलाफ़ कार्यवाही की, अंततः शक राजा ने गर्धभिल्ला को हरा कर उसे बंदी बना लिया. परन्तु बाद में वह भागने में सफल हुआ. भागते हुए उसने एक जंगल में शरण ली. जंगल में ही वह एक बाघ का शिकार हो गया. इस घटना के बाद गर्धभिल्ला के बेटे विक्रमादित्य ने अपने पिता के जीवन का प्रतिशोध लेने की ठानी. इस तरफ़ शकों को अपनी बढती शक्ति का अंदाजा हुआ और उस पर उसे घमंड होने लगा. उनके अत्याचार बढ़ने लगे, उनकी हरक़तें आम- लोगों को दुःख देने लगी. इन सब बातों को देखते हुए सम्राट विक्रमादित्य ने शकों से युद्ध की ठानी. फिर अपना पराक्रम दिखाते हुए शको को पराजित कर आम लोगों को राहत दिलाई. सम्राट ने उन्हें न सिर्फ़ हराया बल्कि उनकी सत्ता को भारतवर्ष से पूरे जड़- से अलग कर दिया.

विक्रम संवत कब शुरू हुआ

इस काल के आरम्भ की शुरुआत 57 ई.पू. विक्रमादित्य के नाम के साथ शुरू हुआ, वैसे इसके इतिहास का स्रोत 9वीं सदी से पहले के इतिहास में नहीं मिलता है. अति प्रारंभिक स्त्रोत में इस काल का वर्णन अन्य नामों से मिलता है जैसे कर्त (सन 343 से सन 371), कृता (सन 404), मालवा (सन 424), या इस काल को केवल “संवत्” भी कहा जाता था.

सबसे प्रारंभ में विक्रम संवत का आरम्भ सन 842 के आस- पास देखने मिलता है. इस उपाधि का प्रथम प्रयोग चौहाण वंश के राजा चंदमहासेन के पास मिलता है. ये धोलपुर के रजा थे. इनके राज्य से प्राप्त स्त्रोत में “विक्रम संवत 898 वैशाख शुक्ल 2” लिखा मिला है. ये एक दिनांक है जिसमे संवत की जगह ’विक्रम संवत’ शब्द का प्रयोग हुआ है. सुभाषित रत्न संदोह (सन 993- 994) वो पहला साहित्यिक काम है, जिसमे सर्वप्रथम ‘विक्रमादित्य’ शब्द का प्रयोग देखने मिलता है.

इन विविधताओं की वजह से अलग- अलग लेखकों और इतिहासकारों की विभिन्न अवधारणाएँ देखने मिलती है. कई इतिहासकारों का मानना है कि विक्रम संवत का सम्राट विक्रमादित्य से कोई सम्बन्ध नहीं है. कुछ इतिहासकार और स्कॉलर मानते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी और अपने शासन काल को विक्रम संवत काल घोषित किया. ब्रिटिश- जर्मन प्राच्यविद रुडोल्फ़ होएर्नले के अनुसार मालवा के राजा यशोधर्मन ने इस काल के नाम का परिवर्तन किया. उनके अनुसार यशोधर्मन ने कश्मीर पर विजय प्राप्त की और इनका नाम ‘हर्ष विक्रमादिया’ पड़ा. इसका विवरण ‘कल्हण’ की पुस्तक ‘रजतरंगिनी’ में मिलता है.

इस तरह हमें विक्रम संवत के विषय में कई विभिन्न स्कॉलरों से विभिन्न मत प्राप्त होते हैं.

संस्कृति (Culture)

विक्रम संवत् के नववर्ष हिन्दू लोगों में बहुत धूम-धाम से मनाये जाते है. इस नव वर्ष के आरम्भ में हिन्दुओं में लोग एक- दुसरे को शुभकामनाएँ देते हैं. ये अक्सर अप्रैल के मध्य में होता है और असम, बंगाल, म्यांमार, पश्चिम बंगाल, केरल, श्रीलंका, तमिलनाडू आदि जगहों के नव वर्षों के सामानांतर हो जाता है.

नेपाल के साथ पूर्वी और उत्तरी भारत में भी विक्रम संवत कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. बुद्ध समुदायों में वैशाख के महीने में बुद्ध पूर्णिमा मनाया जाता है, जो अक्सर अंग्रेजी के मई महीने में होता है. बुद्ध पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जन्म, उनके ज्ञान- चक्षु आदि के उपलक्ष्य में मनाया जाता.

पश्चिम बंगाल में मनाया जाने वाला नया साल ‘पहला वैशाख’ और विक्रम संवत का आरम्भ यद्यपि एक ही दिन नही होते, परन्तु दोनों एक ही महीने में होते हैं. दक्षिण एशिया के कई जगहों के उत्सव विक्रम संवत के कैलेंडर में अंकित उत्सवों से मिलते- जुलते हुए हैं.

नेपाल के रण शासकों ने विक्रम संवत कैलेंडर को वहाँ का औपचारिक कैलेंडर बनाया था.

हिन्दू कैलेंडर (Hindu calendar)

हिन्दू कैलेंडर में तिथियों का बहुत महत्व है. इन तिथियों की ख़ास बात ये है कि ये 24 घंटे के 12- 12 घंटों में नही बदलती हैं, बल्कि ये मूलतः सूर्योदय और सूर्यास्त पर निर्भर करता है. नीचे विक्रम संवत के कैलेंडर के महीनों के नाम अंग्रेजी कैलेंडर के समयानुसार दिए जा रहे हैं.

बैशाख – मध्य अप्रैल से मध्य मईजेष्ठ – मध्य मैं से मध्य जूनआषाढ़ – मध्य जून से मध्य जुलाईश्रावण – मध्य जुलाई से मध्य अगस्तभाद्र – मध्य अगस्त से मध्य सितम्बरआश्विन – मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबरकार्तिक- मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बरअगहन – मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बरपौष – मध्य दिसम्बर से मध्य जनवरीमाघ- मध्य जनवरी से मध्य फरवरीफाल्गुन- मध्य फरवरी से मध्य मार्चचैत्र – मध्य मार्च से मध्य अप्रैलइस तरह विक्रम संवत के कैलेंडर की तिथियाँ अंग्रेजी कैलेंडर की तिथियों से नहीं मिलती है. यद्यपि अंग्रेजी कैलेंडर का इस्तेमाल विश्व स्तर पर होता है, परन्तु ये विक्रम संवत के कैलेंडर से प्रभावित है. हिन्दू कैलेंडर के महीने दो पक्षों में बने हुए होते हैं. शुक्ल पक्ष और कृष्णा पक्ष, दोनों पक्ष पंद्रह-पंद्रह दिनों के होते हैं. कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन में अमावस्या पड़ती है, और शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन पूर्णिमा होती है. हिन्दू कैलेंडर के महीनों के नाम व उनका महत्व जानने के लिए पढ़े.

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