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 बदलते समय के अनुसार होनी चाहिए संविधान की व्‍याख्‍या, कई व्याख्याएं अब उपयोगी नहीं : सुप्रीम कोर्ट 

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संविधान की व्‍याख्‍या बदलते समय के अनुसार होनी चाहिए। पहले की उसकी कुछ व्‍याख्‍याएं अब वैध नहीं रह गई हैं। शीर्ष अदालत ने कहा समाज में किसी व्‍यक्ति का बहिष्‍कार करना संवैधानिक मूल्‍यों के खिलाफ है और इसका नतीजा उसकी नागरिक के रूप में मृत्‍यु होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक धार्मिक समुदाय को अपने असंतुष्टों को बहिष्कृत करने की अनुमति देने वाले अपने 6 दशक पुराने फैसले की फिर से जांच करने का फैसला किया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने दाउदी बोहरा समुदाय में धर्म से बहिष्कृत करने की प्रथा के खिलाफ एक मामला 9 न्यायाधीशों की पीठ को सौंप दिया, ताकि विश्वास के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा निर्धारित किया जा सके। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति एएस ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी शामिल थे, आदेश पारित किया। 1962 के फैसले ने उस कानून को रद्द कर दिया था, जो धार्मिक संप्रदायों को अपने सदस्यों को बाहर करने से रोकने की मांग करता था। पूजा स्थलों में प्रवेश पर रोक के अलावा एक सदस्य के पूर्व-संचार का परिणाम सामाजिक बहिष्कार होगा।

न्यायमूर्ति कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि 1962 के एक और पांच-न्यायाधीशों के फैसले पर एक बड़ी पीठ की ओर से पुनर्विचार की आवश्यकता है। प्रतिवादियों ने शीर्ष अदालत से सबरीमाला मामले में 9 न्यायाधीशों की पीठ के फैसले की प्रतीक्षा करने या वर्तमान मामले को भी 9 न्यायाधीशों की पीठ को भेजने का आग्रह किया था। केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने वाले अदालत के 2018 के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए 9-न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया गया था।

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