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मध्यप्रदेश

चंबल की रेत पर फलती-फूलती है वोटों की फसल, सब शामिल इसलिए मुद्दा ही नहीं बनाते

ग्वालियर। इंदौर के जानापांव से उप्र के इटावा तक के सफर में चंबल नदी तीन राज्य मप्र,राजस्थान और उप्र के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में खासा दखल रखती है। सदा नीरा कही जाने वाली चंबल का पानी जहां तीनों ही राज्यों में किसानों में समृद्द ला रही है तो इसकी रेत राजनेताओं के लिए वोटों की खेती में खाद का काम करती है। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी चंबल से हर साल सैकड़ों करोड़ की अवैध रेत निकालकर सात राज्यों में सप्लाई की जाती है।

संत्री से लेकर मंत्री तक सबको इसका हिसाब-किताब पता है लेकिन मजाल कि इस उत्खनन पर दो शब्द फूटें। कारण स्पष्ट है, ग्वालियर चंबल में जिस तरह बंदूक के लायसेंस के लिए छुटभैया नेता और कार्यकर्ता माननीय का लगभग गुलाम बनने को तैयार हैं उसी तरह रेत के अवैध धंधे को संरक्षण देने की गारंटी के बाद नेताओं को फंड और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज दोनों मिलती है। कहीं-कहीं माननीय खुद ही सीधे तौर से इस धंधे में शामिल हैं तो कहीं कहीं उनके गुर्गे सैकड़ों टैक्टर ट्राली और पोकलेन मशीन से चंबल का सीना छलनी करने में लगे हुए हैं। राजनीतिक दल कोई भी हो बिना रेत की मलाई के कोटा,धौलपुर,भिंड,मुरैना और उप्र के इटावा में जीवित नहीं रह सकते इसलिए इस मामलें पर एक दूसरे को मौन स्वीकृति हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि सबसे बड़ा मुद्दा होते हुए भी आज रेत कोई मुद्दा नहीं है।

 

धंधा बंद कराने नहीं बचाने के लिए चिंता

चंबल में रेत उत्खनन इस कदर हावी है कि इसको बंद कराने के लिए नहीं बल्कि यह बदस्तूर जारी रहे इसके लिए राजनीतिक बयानबाजी जरूर होती रहती है। दो दिन पहले ही भाजपा के कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंषाना जो कि मुरैना जिले से ही आते हैं का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि चुनाव के बाद कोई ट्रैक्टर ट्राली नहीं पकड़ेगा,यदि किसी की पकड़ी गई तो मुझे फोन करें मैं छुड़वाऊंगा। वह यहीं नहीं रुकते और कहते हैं कि यदि गुर्जर समाज के लोग रेत का धंधा नहीं करेंगे तो क्या करेंगे। जब वह बोल रहे थे तब उन्हें पता था कि उनका वीडियो बनाया जा रहा है बावजूद इसके उन्होंने बोलना जारी रखा क्योंकि इस तरह के वायदे नुकसान नहीं अंचल में फायदा करवाते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि वह तो रेत के घाटों को कानूनन नीलामी की बात कह रहे थे। यहां यह बताना जरूरी होगा कि कंषाना के बेटे पर अवैध रेत उत्खनन के कारोबार में राजस्थान पुलिस के जवानों की पिटाई और अपहरण का केस होने के कारण धौलपुर पुलिस इनाम तक घोषित कर चुकी है।

 

हो-हल्ला खूब हुआ,कार्रवाई नहीं

 

कोटा में चंबल रिवर फ्रंट बनाकर जहां इसके घाट की खूबसूरती में चार चांद लगाए गए हैं तो वहीं धौलपुर,मुरैना और भिंड में अवैध खनन से नदी को बदसूरत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। एक साल पहले जब उमाभारती मुखर थीं तब राजस्थान के धौलपुर से चंबल पुल पार करते हुए मुरैना में प्रवेश करने के दौरान उन्होंने ट्वीटर पर अवैध उत्खनन की लाइव रिपोर्टिंग करते हुए कहा था कि अवैध रेत के सैकड़ों ट्रैक्टर युद्धाभ्यास करने वाले टैंक की तरह लग रहे हैं, यह अराजकता है। अपनी ही पार्टी की सरकार को घेरने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि हो सकता है कि रेत माफिया पर कोई बड़ा आपरेशन चले लेकिन एक ट्राली तक नहीं पकड़ी गई। क्या नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल क्या कोट-कचहरी सबने हर दल की सरकार को खूब आदेश-निर्देश दिया लेकिन कार्रवाई के नाम पर ढाक के तीन पात ही बने रहे।

 

डकैत से ज्यादा खतरनाक है रेत माफिया

 

चंबल में उत्खनन करने वाले रेत माफिया डकैतों से अधिक खतरनाक हैं। जिस एरिया में रेत उत्खनन हो रहा होता है वहां यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई भी दे जाए तो उसकी जान पर बन आती है। रेत के ट्रैक्टरों को दौड़ा रहे नौजवान लड़कों को ट्रेनिंग दी जाती है कि किसी भी सूरत में ट्रैक्टर नहीं पकड़ा जाना चाहिए उसके लिए सामने वाले पर भले ही उसे चढ़ाकर भागना पड़े। आइपीएस नरेंद्र कुमार की ट्रैक्टर चढ़ाकर हत्या उसी ट्रेनिंग का नतीजा थी। अब रेत के इस पूरे खेल में माफिया, पुलिस,प्रशासन और जनप्रतिनिधि एक टीम की तरह खेलते हैं।

 

बंद नहीं लीगल करने की तैयारी

 

चंबल नदी के घाटों पर कुछ साल पहले तक घड़ियाल व कछुए अंडे दिया करते थे इसीलिए नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल ने इस नदी को खनन के लिए प्रतिबंधित कर रखा है। माफिया ने ज्यादा से ज्यादा रेत निकालने के लिए इन घाटों को बेतरतीब ढंग से खोदना शुरू कर दिया। इस कारण कछुए व घड़ियालों ने इन क्षेत्रों में अंडे देना बंद कर दिया था। कुछ साल पहले तक राजघाट के आसपास डाल्फिन भी दिखतीं थीं, वे यहां से पलायन कर गई है। चंबल नदी के जिन घाटों से रेत का अवैध उत्खनन कर माफिया मालामाल हो गए, उनकी रेत बेचकर सरकार भी हर साल कम से कम 75 करोड़ रुपये कमाएगी। सीमित दायरे में वैध उत्खनन से घड़ियाल, कछुआ व अन्य जलीय जीव भी बचे रहेंगे, जो माफिया के अवैध कारोबार की भेंट चढ़ जाते थे।

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