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13 करोड़ रुपये खर्च कर कबाड़ से किया ‘कमाल’ अब हो रही शराबखोरी

जबलपुर। नगर निगम ने ‘कबाड़ से कमाल’ का नवाचार कर खूब सुर्खियां बटोरीं। स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत इस नवाचार का देशभर में डंका बजा, लेकिन गुजरते वक्त के साथ नगर निगम के अधिकारियों के अनदेखी के चलते कबाड़ से किया कमाल फिर कबाड़ में तब्दील हो रहा है। नगर निगम ने चलन से बाहर हो चुकी सात पुरानी मेट्रो बसों को नागरिकों की सुविधा के लिहाज से चलित पुस्तकालय, बर्तन बैंक, महिलाओं के चेजिंग रूम और आश्रय स्थल और फन बस नाम देकर सात मेट्रो बसों को इस तरह से जनउपयोगी बनाया था, जिसे ‘कबाड़ से कमाल’ नाम दिया गया।

डुमना नेचर पार्क में फन बस के रूप में बच्चों का मनोरंजन कर रही

 

एक बस को जनोपयोगी बनाने में 25 से 30 हजार रुपये खर्च किए गए थे। अब इनमें से छह बसें वर्तमान में दीनदयाल चौक स्थित अंतरराज्यीय बस टर्मिनस में लावारिस खड़ी-खड़ी फिर कबाड़ में तब्दील हो रही हैं। इनकी सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैंं। जो सामान इनमें रखा था वह चोरी हो चुका है, जिस बस को आश्रय स्थल मतलब मुसाफिरों के लिए सोने, आराम करने के लिए बनाया गया था उसमें शराबखोरी हो रही है। नगर निगम अब इन बसों की कोई सुध नहीं ले रहा है। एक बस जरूर डुमना नेचर पार्क में फन बस के रूप में बच्चों का मनोरंजन कर रही है।

 

महंगे पर्दे, कालीन, गद्दे व आलमारियाें से सजाया था

नगर निगम ने पुरानी मेट्रो बसों काे मॉडिफाई कराते हुए इन्हें सर्वसुविधा युक्त जनउपयोगी बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च किए गए। चलित पुस्तकालय के रूप में तब्दील की गई बस में पंखे, गमले सहित किताबें रखने आलमारी व पुस्तक स्टैंड बनाए गए थे, उसमें किताबें भी रखी गई थी, महंगे कालीन, बैठकर पड़ने के लिए फर्नीचर भी लगाया गया था। इसी तरह आश्रय स्थल के रूप में बनाई बस में महंगे पर्दे, गद्दे भी बिछाए गए गए थे।

 

महंगे पर्दे,आइना, तेल, कंघी आदि की व्यवस्था थी

 

महिलाओं के लिए जिस बस को चेजिंग रूम बनाया गया था उसमें भी महंगे पर्दे,आइना, तेल, कंघी आदि की व्यवस्था थी। ये सुविधा नागरिकों को ज्यादा दिनों तक नहीं मिल पाई। नगर निगम के अधिकारियों की लापरवाही के कारण अंतरराज्यीय बस टर्मिनस में खड़ी ये बसें मौसमी मार झेलकर फिर कबाड़ की शक्ल ले रही हैं। बसों से अधिकांश सामान व जरूरी पार्टस चोरी हो गए हैं।

 

नीलाम करने की थी योजना

 

अंतराष्ट्रीय बस टर्मिनस में रंग-पुताई व माडिफाई की गईं इन पुरानी बसों को दोबारा लावारिस छोड़ दिए जाने से नागरिक भी नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। आस-पास के दुकानदारों का कहना है कि यदि नगर निगम चलन से बाहर इन पुरानी बसों की नीलामी कर देता तो कुछ राशि ही मिल जाती। 2010-11 में जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत 13 करोड़ रुपये खर्च 119 लाल रंग की मेट्रो बसें खरीदी थीं, जिसमें से 29 बसें खटारा होकर चलन से बाहर हो गई थीं।

 

मेट्रो बसों की नीलाम करने के लिए निविदा जारी की थी

 

आठ माह पूर्व नगर निगम ने चलन से बाहर हो चुकी मेट्रो बसों की नीलाम करने के लिए निविदा जारी की थी। लेकिन एक बस की कीमत करीब साढ़े सात लाख रुपये आंकी गई। हुआ ये कि कोई निविदा भरने आगे नहीं आया और बसों की नीलामी प्रक्रिया टल गई। नगर निगम ने इन बसों का नवाचार करने का निर्णय लिया और सात बसों में नवाचार किया जबकि शेष खटारा बसों में भी नवाचार की योजना बनाई थी।

 

नवाचार की बसों में अनैतिक कृत्य

 

अंतराज्यीय बस टर्मिनल के व्यापारियों का कहना है कि इन बसों की देखरेख कोई नहीं करता है। रात होते ही इन बसों के भीतर शराबखोरी सहित अनैतिक कृत्य होने लगता है। शराब की खाली बोतले इसकी गवाही भी दे रही हैं। क्योंकि जिस स्थान पर इन्हें रखा गया है वहां सुरक्षा के इंतजाम भी नही है। बसें के दरवाजे भी टूट गए हैं।

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