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धारा 125 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल पाएगा मुस्लिम महिलाओं के हालात?

दिल्ली की रहने वाली नजमा बानो (बदला हुआ नाम) पढ़ी-लिखी हैं, पत्रकार हैं. उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की है. अपने अधिकार बहुत अच्छे से समझती हैं. जब पति से अलग हुईं तो सीधे सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारे भत्ते की मांग की और कोर्ट में लड़कर अपना हक लिया. कल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में नजमा बानो को कुछ नया नहीं लगता है. नजमा के मामले में भी यही फैसला दो साल पहले हो चुका है, लेकिन नजमा हैरान हैं, इस बात से कि देश में निचली अदालतें अभी भी पर्सनल लॉ बोर्ड के हिसाब से फैसले दे देती हैं.

सवाल सिर्फ नजमा बानो का नहीं है. सबकी किस्मत और हालात नजमा बानो जैसे नहीं होती. वह खुद कहती हैं कि ‘गांव-कस्बों में जो मुस्लिम महिलाएं पढ़ी- लिखी नहीं हैं, उनको ये मालूम ही नहीं हैं कि इद्दत के बाद भी वो गुजारा भत्ता पाने की हकदार हैं. धारा 125 में तो तलाक नहीं भी हुआ है तो भी वो गुजारे भत्ते की मांग कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को आए फैसले से महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ेगी. और उन्हें पता चलेगा कि आदमी सिर्फ इद्दत के तीन महीने में मेंटीनेस देकर पीछा नहीं छुड़ा सकता. वो भी गुजारा भत्ता की उतनी हकदार है जितनी कि भारत में दूसरी औरतें.

क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सब बदल जाएगा?

झारखंड के पलामू की शाबाना (बदला हुआ नाम) ऐसा नहीं मानती. वह कहती हैं कि खाली सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महिलाओं को न्याय नहीं मिल जाता. शबाना जब रिपोर्ट लिखवाने गईं तो तत्कालीन थाना प्रभारी ने उनसे कह दिया था कि मुसलमानों में तो महिलाओं को बस इद्दत के तीन महीने ही मेंटीनेंस मिलता है. आप बेकार में यहां आई हैं. शबाना ने 2017 से अपने पति के खिलाफ मेंटीनेस का केस डाला था. पति दहेज के लिए परेशान करता था, लड़की पैदा होने के बाद हालात और खराब हो गए. उन्हें घर से निकाल दिया गया. कोर्ट में उनके पति के परिवार ने भी यही तर्क दिया कि पर्सनल लॉ में ऐसा कोई कानून नहीं हैं. आठ साल से मेंटीनेंस का केस चल रहा है पर शबाना के हाथ एक पाई नहीं आई है. जबकि वो खुद और पति दोनों ही पढ़े लिखे घरों से हैं. पति बच्ची तक के भरष-पोषण के लिए तैयार नहीं है.

चार-चार शादियों पर रोक लगाने की जरूरत

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की संस्थापक शाइस्ता अंबर भी कोर्ट के फैसले का स्वागत करती हैं और कहती हैं कि अब चार-चार शादियों पर भी रोक लगाने की जरूरत है. शाइस्ता कहती हैं कि ”पर्सनल लॉ बोर्ड जरूर इस फैसले से असहमति जताएगा, क्योंकि इस्लाम में ऐसी व्यवस्था नहीं हैं पर इस्लामिक देशों में विधवाओं, तलाक शुदाओं, अनाथों के लिए ‘बैतूल माल’ जैसे व्यवस्था होती है, जो भारत में नहीं है, क्योंकि ये इस्लामिक देश नहीं है, लेकिन तलाक के बाद हम महिलाओं को सड़क पर तो नहीं छोड़ सकते, उन्हें भी अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी चलानी है, इसलिए संविधान से चलने वाले हमारे देश में ऐसी महिलाओं के लिए जो संविधान सम्मत व्यवस्थाएं हैं वो उन्हें मिलनी चाहिए. पर्सनल लॉ बोर्ड की आड़ में पुरुष महिलाओं का हक मारने की कोशिश करते हैं.

धोखा देकर की शादी, अब दे दिया तलाक

मुंबई से सटे मुंब्रा में रहने वाली नसरीन खान (बदला हुआ नाम) ने ऑन लाइन पोर्टल के जरिए चेन्नई में रहने वाले एक शख्स से शादी की थी. नसरीन एक फार्मा कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर थीं. अच्छी खासी जॉब थी पर शादी के लिए जॉब छोड़कर चेन्नई शिफ्ट हो गईं. पति ने कहा मैं दूसरे लड़कों के साथ फ्लैट शेयर करता हूं. तुम्हें वहां नहीं ले जा सकता, कुछ दिनों बाद एक सही सा किराए का फ्लैट लेकर शिफ्ट हो जाएंगे. अभी होटल में रुको. नसरीन को लगा ठीक है, इसमें क्या परेशानी हैं..लेकिन वो कुछ दिन, हफ्तों में और फिर महीनों में बदल गए लेकिन पति उन्हें घर में नहीं लेकर गया..

हर बार कुछ टालमटोल कर देता. नसरीन प्रेग्नेंट हो गईं तो डिलीवरी के लिए मुंब्रा आ गईं. पति बीच-बीच में मिलने आता रहा लेकिन उन्हें चेन्नई ले जाने का नाम नहीं लिया.इस बीच नसरीन का एक्सीडेंट हो गया तो उन्हें अपनी और बच्चे की देखभाल के लिए साल भर माता-पिता के साथ रुकना पड़ा. जब पति तैयार नहीं हुआ तो आखिरकार जबर्दस्ती नसरीन चेन्नई चली गई. वहां जाकर उन्हें पता चला कि वो अपने पति की दूसरी बीबी हैं. पहली पत्नी पति के मां-बाप के साथ उसी शहर में रहती हैं और अब वो तीसरी शादी करने जा रहा है.

नसरीन के पैरों तले जमीन खिसक गई पर वो कुछ भी करके पति की तीसरी शादी नहीं रुकवा पाईं और उसके हाथों मार-पीट का भी शिकार हुई. अब नसरीन गुजारे के लिए अपने पिता और भाई पर निर्भर हैं, बेटा दस साल का हो गया है पर उन्हें पति से आजतक गुजारे के लिए एक पैसा नहीं मिला है. धारा 125, 498 और डीवी एक्ट के तहत उन्होंने केस डाला हुआ है, लेकिन बस तारीखें पड़ जाती हैं. नसरीन का आरोप है कि पति की तरफ से जानबूझकर केस की सुनवाई की गति धीमी करने की कोशिश की जा रही है. एक्सीडेंट के बाद उन्हें वर्टिगो और कुछ और न्यूरो बीमारियां हो गईं जिसकी वजह से वो काम भी नहीं कर सकतीं.

नसरीन का कहना है कि ‘धारा 125 के तहते पहले से ही महिलाओं के मेंटीनेंस की व्यवस्था है पर समस्या पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया में है. मैंने अपने पति के मोबाइल से उस महिला का नंबर निकाल लिया था जिससे वो तीसरी शादी करने जा रहा था. मैंने पुलिस से कहा कि ये उसको भी धोखा दे रहा है आप रोकिए. पर पुलिस ने मुझसे कहा आप अपने से मतलब रखिए. मुझे अपनी FIR दर्ज कराने में ही साल भर धक्के खाने पड़े. मेरा पति तो केस की सुनवाई के लिए आता ही नहीं है, उसका वकील भी छुट्टी मार जाता है. मामला खिंचता ही जा रहा है. पिता और भाई के पैसों पर मैं खुद को और बच्चे को कैसे पाल रही हूं मैं ही जानती हूं, मेरा बेटा दस साल का हो चुका है. पीड़िताओं की मानें तो कमी कानून में नहीं है, उसके पालन में है. ज्यूडिशयरी और पुलिस दोनों को ही महिलाओं की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए ज्यादा प्रयास करने पड़ेंगे.

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