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7 में से 1 जज ने कोटा के अंदर कोटा का किया विरोध, जानें उन्होंने क्या आपत्ति जताई?

भारत में कई तरह की जातियां हैं, साथ ही कई ऐसी जातियां हैं जो आज भी काफी पिछड़ी हुई है और कोटा के बावजूद वो आगे नहीं बढ़ पा रही है, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार यानी 1 अगस्त को ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने SC-ST श्रेणियों में ही उप-वर्गीकरण (कोटे के अंदर कोटा) की वैधता पर फैसला सुना दिया. कोर्ट ने राज्यों को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में उप-वर्गीकरण यानी कोटे के अंदर कोटे की इजाजत दे दी है.

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया है. सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली 7 जजों की संविधान पीठ ने तय किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के लिए उप-वर्गीकरण किया जा सकता है.

कोर्ट ने सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक समानता के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों (SC/ST) में सब-कैटेगरी के चलते अधिक पिछड़े लोगों को अलग से कोटा देने पर मंजूरी दी है. सर्वोच्च अदालत ने बताया कि सब-कैटेगरी तय करते समय राज्य किसी भी सब-कैटेगरी के लिए 100% आरक्षण निर्धारित नहीं कर सकता है.

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले की तीन दिनों तक सुनवाई करने के बाद इस साल 8 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

आर्टिकल 341 खारिज

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि 6 जजों का फैसला इस मामले के पक्ष में हैं, सभी एकमत हैं. सात जजों की बेंच में एक जस्टिस बेला.एम त्रिवेदी इस फैसले के खिलाफ थीं. इसी फैसले के साथ कोर्ट ने 2004 के ई.वी चिन्नैया आर्टिकल 341 के फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि उप-वर्गीकरण की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए.

सात जजों की संविधान पीठ दरअसल दो पहलुओं पर विचार कर रही थी. पहला ये कि क्या आरक्षित जातियों के साथ उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जानी चाहिए? दूसरा ईवी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (2005) के फैसले पर भी कोर्ट विचार कर रहा था. इस फैसले में कहा गया था कि अनुच्छेद 341 के तहत नोटिफाइड अनुसूचित जातियां एक ही समूह हैं और उनमें सब कैटेगरी नहीं की जा सकती.

समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं

बहुमत ने फैसले में कहा कि सब कैटेगरी पर दिया गया कोटा अनुच्छेद 14, 341 का उल्लंघन नहीं करता. सीजेआई डी.वाई.चंद्रचूड़ ने अपने और जस्टिस मिश्रा के लिखे गए फैसले में ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला दिया, फैसले में कहा गया कि ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि अनुसूचित जातियां एक जैसा वर्ग नहीं हैं. उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है.साथ ही उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लंघन भी नहीं करता है. कोर्ट ने आगे कहा, अनुच्छेद 15 और 16 में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो राज्य को किसी जाति को उप-वर्गीकृत करने से रोकता हो.

राज्य के लिए क्या है शर्त

साथ ही कोर्ट ने राज्य को जातियों के उप-वर्गीकरण के लिए आधार बताते हुए कहा, राज्यों को जातियों की तादाद और प्रदर्शनीय डेटा के आधार पर ही उप-वर्गीकरण करने की इजाजत है. राज्य अपनी मर्जी या राजनीतिक सुविधा के अनुसार काम नहीं कर सकता है.

राज्य अधिक पिछड़ों को दे सकता है तरजीह

जस्टिस बीआर गवई ने अपने सहमत निर्णय में कहा कि अधिक पिछड़े समुदायों को तरजीह देना राज्य का कर्तव्य है. SC/ST की श्रेणी में केवल कुछ लोग ही आरक्षण का आनंद ले रहे हैं. जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता और SC/ST के अंदर भी ऐसी कई श्रेणियां हैं जिन्हें सदियों से अधिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है.

ई.वी.चिन्नैया, 2005 में क्या खामी

ई.वी.चिन्नैया मामले में मूल खामी यह है कि यह इस समझ के आधार पर आगे बढ़ा गया था कि अनुच्छेद 341 आरक्षण का आधार है. अनुच्छेद 341 केवल आरक्षण के उद्देश्य से जातियों की पहचान से संबंधित है. उप-वर्गीकरण का आधार यह है कि बड़े समूह के अंदर भी एक समूह को अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

क्रीमी लेयर को SC/ST पर लागू किया जाए

जस्टिस गवई ने कहा कि राज्य को SC/ST श्रेणी के बीच क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें सकारात्मक कार्रवाई के दायरे से बाहर करने के लिए एक नीति विकसित करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि सच्ची समानता हासिल करने का यही एकमात्र तरीका है.

जस्टिस विक्रम नाथ ने भी इस मामले में सहमति जताई है. उन्होंने कहा, ओबीसी पर लागू क्रीमी लेयर सिद्धांत एससी पर भी लागू होता है. जस्टिस पंकज मित्तल ने भी इस पर सहमति जताई, उन्होंने कहा, आरक्षण एक पीढ़ी तक सीमित होना चाहिए. अगर पहली पीढ़ी आरक्षण के जरिए बेहतर स्तर तक पहुंच गई है और पिछड़ेपन से बाहर आ गई है तो दूसरी पीढ़ी को इसका हकदार नहीं होना चाहिए. जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी इस बात का समर्थन किया.

जस्टिस त्रिवेदी ने जताई असहमति

7 जजों की पीठ में से एक ही जज ने इस फैसले पर असहमति जताई. जस्टिस त्रिवेदी ने इस फैसले पर असहमति जताते हुए कहा, अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित अनुसूचित जातियों की राष्ट्रपति सूची में राज्य द्वारा कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता. संसद द्वारा पारित कानून के द्वारा ही जातियों को राष्ट्रपति सूची में शामिल या बाहर किया जा सकता है.

उप-वर्गीकरण राष्ट्रपति सूची में छेड़छाड़ के समान होगा. अनुच्छेद 341 का मकसद SC/ST सूची में भूमिका निभाने वाले किसी भी राजनीतिक कारक को समाप्त करना था. उन्होंने कहा, कार्यकारी शक्ति में राज्यों के पास जातियों को उप-वर्गीकृत करने और सभी SC के लिए आरक्षित लाभों को सब-कैटेगरी तक पहुंचाने के लिए कोई क्षमता नहीं है.

2010 में भी उठा था मामला

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने 2010 में ई.वी. चिन्नैया मामले में जस्टिस एन. संतोष हेगड़े, जस्टिस एस.एन. वरियावा, जस्टिस बी.पी. सिंह, जस्टिस एच.के. सेमा, जस्टिस एस.बी. सिन्हा की पीठ ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 341(1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश में सभी जातियां एक ही वर्ग की हैं और उन्हें आगे विभाजित नहीं किया जा सकता.

अनुच्छेद 341 (1) में क्या कहा गया

अनुच्छेद 341(1) के तहत भारत के राष्ट्रपति किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कुछ समूहों को आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जाति के रूप में नामित कर सकते हैं. राज्यों के लिए अनुसूचित जातियों का नामकरण राज्यपाल के साथ बातचीत करके लिया जाना चाहिए और फिर सार्वजनिक रूप से अधिसूचित किया जाना चाहिए.

यह नामकरण जातियों, नस्लों, जनजातियों या उनके उप-समूहों की श्रेणियों के बीच किया जा सकता है. इसमें आगे कहा गया कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य लोक सेवा; राज्य लोक सेवा आयोग) की प्रविष्टि (ENTRY) 41 या सूची III (शिक्षा) की प्रविष्टि 25 से संबंधित कोई भी ऐसा कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा.

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