ब्रेकिंग
Congress Election Result: अभिषेक चौधरी को मिले सबसे ज्यादा 6.15 लाख वोट, राजस्थान यूथ कांग्रेस अध्यक... Rajasthan Kinnar House Theft: पुरानी रंजिश की आशंका के तहत पुलिस कर रही जांच, अज्ञात आरोपियों की तला... Chimur Ashramshala Controversy: डैंड्रफ की समस्या के नाम पर छात्रों के साथ अजीब सलूक, वायरल तस्वीरों... BJP vs Shinde Sena: नागपुर में बीजेपी के सामने बागी पूर्व विधायक की चुनौती, सीटों के बंटवारे के बाद ... Ulhasnagar Mahayuti Crisis: महाराष्ट्र में महायुति में पड़ी फूट! बीजेपी ने शिंदे सेना से अलग होने का... CM Vishnu Deo Sai Singapore Visit: छत्तीसगढ़-सिंगापुर साझेदारी से खुलेंगे विकास के नए रास्ते, ग्रीन ... Chhattisgarh PMAY Success: छत्तीसगढ़ में बिना सरकारी खर्च के मिली 25,413 आवासों के लिए जमीन, केंद्र ... Kanker Divyang Camp: जगदलपुर में 7 अक्टूबर को लगेगा निःशुल्क दिव्यांग शिविर, कलेक्टर कुन्दन कुमार ने... Raipur Police Reshuffle: मुख्यमंत्री और राजभवन सुरक्षा में बदले गए अधिकारी, गृह विभाग ने जारी किया न... Sahibganj Murder Mystery Solved: साहिबगंज में गौरचंद्र बागती हत्याकांड का खुलासा, चचेरा भाई ही निकला...
देश

संस्कृत बनी बच्चों की भाषा! BAPS के ‘मिशन राजीपो’ से जुड़े 40,000+ बच्चे, महंत स्वामी महाराज के मार्गदर्शन में अनोखा अभियान

आज के युग में जहां डिजिटल तकनीक मन को उत्तेजित करती है, परंतु शांति को छीन लेती है, वहां बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था का मिशन राजीपो एक ऐसा प्रकाश-पथ बनकर उभरा है, जहां आध्यात्मिक शिक्षा और चरित्र-निर्माण साथ-साथ चलते हैं. सन् 2024 में परम पूज्य महंत स्वामी महाराज ने यह दिव्य संकल्प किया कि विश्वभर के बालकों को संस्कृत श्लोकों का अध्ययन और पाठ करना चाहिए.

उन्होंने कहा, “संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है.” उन्होंने समझाया कि जो बालक संस्कृत श्लोकों को आत्मसात् करते हैं और उन्हें जीवन में उतारते हैं, वे केवल आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करते हैं.

महंत स्वामी महाराज ने यह लक्ष्य रखा कि एक वर्ष में 10,000 बालक संस्कृत श्लोकों को कंठस्थ करें. परंतु यह प्रेरणा तो जैसे पवित्र अग्नि बनकर फैल गई, जो लक्ष्य के रूप में प्रारम्भ हुआ था. वह शीघ्र ही आंदोलन बन गया, 40,000 से अधिक बालकों ने उत्साहपूर्वक इसमें भाग लिया. इनमें से 15,666 बालक-बालिकाओं ने सत्संग दीक्षा ग्रंथ के सभी 315 संस्कृत श्लोकों को पूर्णतः कंठस्थ किया और परीक्षा में उत्तीर्ण हुए. हजारों अन्य बालक आज भी इस अध्ययन, चिंतन और आत्म-परिवर्तन की साधना-यात्रा में आगे बढ़ रहे हैं.

संस्कृत-अध्ययन के पीछे की गहन दृष्टि

महंत स्वामी महाराज की दृष्टि आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी थी. उन्होंने कहा कि संस्कृत उच्चारण को परिष्कृत, शब्द-भंडार को समृद्ध और बुद्धि को तीक्ष्ण बनाती है.

नियमित संस्कृत श्लोक-जप से एकाग्रता, स्पष्टता और मानसिक पवित्रता बढ़ती है, जिसे अब आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है. इस प्रकार, उन्होंने संस्कृत को केवल धार्मिक भाषा नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और आत्म-परिवर्तन का आध्यात्मिक विज्ञान बताया.

सत्संग दीक्षा: जीवन का दिशा-सूत्र

सत्संग दीक्षा के 315 श्लोक मात्र पाठ नहीं हैं, वे जीवन के सूत्र हैं. हर श्लोक एक नैतिक दिशा-सूचक की तरह है, जो बच्चों में निम्न गुणों का विकास करता है-

  1. सत्यनिष्ठा: सत्य बोलना और ईमानदारी से जीना.
  2. न्याय और अपरिग्रह: जो अपना नहीं है उसे न लेना और निष्पक्षता बनाए रखना.
  3. एकाग्रता और अध्ययन: मन से, लगन से सीखना.
  4. सेवा और करुणा: दूसरों की सहायता करना और उनके दुखों में सहभागी बनना.
  5. ममता और श्रद्धा: हर जीव में भगवान का दर्शन करना.
  6. आदर और आज्ञाकारिता: माता-पिता, गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करना.
  7. एकता और सहयोग: सबके उत्थान में अपना उत्थान समझना.
  8. अनुशासन और मर्यादा: संयम और सदाचार-पूर्ण जीवन जीना.
  9. धैर्य और आत्म-नियंत्रण: क्रोध पर विजय पाकर अंतर्मन में शांति स्थापित करना.

इन श्लोकों के माध्यम से बच्चे यह सीख रहे हैं कि सच्चा ज्ञान वही है जो आचरण में उतरे. वे केवल संस्कृत नहीं सीख रहे, बल्कि करुणा, नम्रता, सत्य और सामंजस्य जैसे संस्कारों को आत्मसात् कर रहे हैं, जो दिव्य जीवन का सार हैं.

वैश्विक संस्कार-आंदोलन

भारत से लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अफ्रीका तक बालक-बालिकाओं ने इस भक्ति और अनुशासन-यज्ञ में भाग लिया. उनके पीछे थे 103 साधुगण, 17,000 स्वयंसेवक, और 25,000 अभिभावक, जिनके सामूहिक पुरुषार्थ ने इस पहल को विश्वव्यापी संस्कार-आंदोलन में बदल दिया.

मिशन राजीपो: आस्था का भविष्य, पवित्रता की शक्ति

यह अभियान सिद्ध करता है कि जब संस्कार बचपन में बोए जाते हैं, तब भविष्य प्रकाश से खिल उठता है. आज के ये बालक ही कल के परंपरा-प्रदीपक बन रहे हैं, जो आधुनिकता के साथ आध्यात्मिकता, बुद्धि के साथ ईमानदारी, और अध्ययन के साथ प्रेम को जोड़ते हैं.

Related Articles

Back to top button