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पूर्वोत्तर बना प्रदूषण का नया केंद्र! CREA की रिपोर्ट में खुलासा, देश के 60 से अधिक जिलों की हवा खराब

भारत में हवा लगातार जहरीली होती जा रही है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ बड़े शहरों में लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो रही है, बल्कि छोटे शहरों में भी हवा की क्वालिटी में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है. इसी चिंता को सामने लाने के लिए ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ यानी CREA ने एक नया रिसर्च किया है. इस रिसर्च से ये भी साफ पता चलता है कि दिल्ली पूरे भारत में सबसे ज्यादा प्रदूषित है. यहां हवा में मौजूद बेहद छोटे जहरीले कण PM2.5 का स्तर इतना अधिक है कि यह भारतीय मानक से भी ढाई गुना ज्यादा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से तो दिल्ली की हवा बीस गुना ज्यादा गंदी पाई गई है. इसका मतलब है कि दिल्ली में रहने वाले लोगों की सेहत लगातार खतरे में बनी हुई है और उन्हें हर दिन दूषित हवा में सांस लेना पड़ रहा है.

रिपोर्ट में पूरे देश के 749 जिलों की वायु गुणवत्ता को उपग्रह की मदद से जांचा गया. नतीजे बहुत चौंकाने वाले रहे. इतनी बड़ी जांच में एक भी जिला ऐसा नहीं मिला जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुसार साफ हवा की श्रेणी में आता हो. इतना ही नहीं, लगभग 447 जिले यानी करीब 60 प्रतिशत इलाके ऐसे मिले जहां हवा की गुणवत्ता भारत के राष्ट्रीय मानकों से भी काफी खराब थी. इससे साफ समझ आता है कि भारत में साफ हवा अब बहुत कम जगहों पर मिलती है और हवा से जुड़ा खतरा अब सामान्य बात हो चुका है.

किस राज्य के कितने जिले प्रदूषण से हैं प्रभावित

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छोटे राज्यों में भी तेजी से बढ़ रहा है प्रदूषण

इस रिसर्च में सबसे ज्यादा दूषित हवा से प्रभावित जिले दिल्ली, असम, हरियाणा और बिहार में पाए गए हैं. दिल्ली और असम के 11-11 जिले, पचास सबसे प्रदूषित जिलों में शामिल हैं. दूसरी ओर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, त्रिपुरा और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों के सभी जिलों की हवा राष्ट्रीय मानक से खराब पाई गई है. इसका अर्थ यह है कि प्रदूषण अब शहरों के साथ-साथ पहाड़ी और उत्तर-पूर्वी राज्यों तक पहुंच चुका है. बिहार के 38 में से 37, गुजरात के 33 में से 32, पश्चिम बंगाल के 23 में से 22, और राजस्थान के 33 में से 30 जिलों में हवा हानिकारक है. इसके बावजूद, दक्षिण भारत के राज्य अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं. पुदुचेरी में वायु प्रदूषण का स्तर देश में सबसे कम रहा और तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी हालात थोड़े संभले हुए हैं, हालांकि विश्व मानक से यह स्थिति भी कई गुना खराब है.

सर्दियों के महीनों में बढ़ जाता है प्रदूषण

रिपोर्ट में मौसम का भी गहरा प्रभाव पाया गया है. सर्दियों के महीनों में जब धुंध और ठंड हवा को नीचे रोक लेते हैं, तो प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक उछाल मारता है. इस मौसम में 82 प्रतिशत जिलों में स्थिति खतरनाक स्तर पर चली जाती है. गर्मी में कुछ राहत जरूर दिखती है, लेकिन तब भी देश के आधे से अधिक जिले प्रदूषण की सीमा से ऊपर बने रहते हैं. मानसून ही एक ऐसा मौसम है जब बारिश हवा को थोड़ी राहत देती है, लेकिन जैसे ही बारिश कम होती है, हवा फिर से धुंधली और जहरीली होने लगती है. यानी प्रदूषण अब केवल मौसमी संकट नहीं रहा, बल्कि बारहों महीने, लगातार चलता रहने वाला संकट बन गया है.

मौसम से हिसाब से जानें प्रदूषण का हाल

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इंडो-गैंगेटिक क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर और खराब

इस रिपोर्ट की सबसे अहम खासियत है ‘एयरशेड विश्लेषण’. हवा के प्रवाह और भूगोल के आधार पर बनने वाले विशेष क्षेत्रों को एयरशेड कहा जाता है. इस अध्ययन में पाया गया कि इंडो-गैंगेटिक क्षेत्र, जिसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब आते हैं, देश का सबसे प्रदूषित क्षेत्र है. यहां की हवा लंबे समय से भारी प्रदूषण झेल रही है. इसके साथ-साथ पूर्वोत्तर के एयरशेड में भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है. असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में मानसून भी हवा को पूरी तरह साफ नहीं कर पाता और वार्षिक तौर पर प्रदूषण बना रहता है. यह संकेत है कि इन राज्यों में प्रदूषण के मूल स्रोत लगातार सक्रिय हैं और इनमें कमी लाने के लिए बड़े स्तर पर नीति बदलाव की जरूरत है.

पूरे एयरशेड क्षेत्र के लिए बनानी होगी एक नीति

विशेषज्ञों का कहना है कि हवा की गुणवत्ता में सुधार तभी संभव है जब वायु प्रदूषण को एक साझा समस्या के रूप में देखा जाए. केवल बड़े शहरों की सीमाओं के भीतर प्रदूषण नियंत्रण की कोशिश नाकाफी है, क्योंकि हवा की कोई सीमाएं नहीं होतीं. प्रदूषण एक जिले से दूसरे और एक राज्य से दूसरे राज्य में सरलता से पहुंच जाता है. इसलिए जरूरी है कि पूरे एयरशेड क्षेत्र के लिए एकीकृत नीति बनाई जाए. CREA के विश्लेषक मनोज कुमार के शब्दों में, भारत की स्वच्छ हवा की चुनौती को अब शहरों या सर्दियों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि प्रदूषण लगभग पूरे साल और लगभग पूरे देश में लोगों को प्रभावित कर रहा है. ऐसे में सख्त उत्सर्जन नियंत्रण, उपग्रह आधारित मॉनिटरिंग को सरकारी योजनाओं में शामिल करना और जिम्मेदारी तय करने वाली कानूनी व्यवस्था जैसे कदम अनिवार्य हैं.

फेफड़ों में धीमे जहर जैसी होती जा रही है हवा

इस अध्ययन का निष्कर्ष एक सीधी चेतावनी है कि भारत की हवा में अब बीमारी घुल चुकी है. हर दिन लाखों-करोड़ों लोग ऐसी हवा में सांस लेने पर मजबूर हैं जो उनके फेफड़ों के लिए किसी धीमे जहर जैसी है. यह समस्या अब केवल पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि मानव जीवन और स्वास्थ्य का केंद्र बिंदु है. यदि आज भी स्वच्छ हवा को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां शायद इस संघर्ष को और कठिन रूप में झेलेंगी. साफ और सुरक्षित हवा मानव का मूल अधिकार है और इसे बचाने की जिम्मेदारी समाज, सरकार और उद्योग सभी की है, क्योंकि हवा न किसी शहर की है, न किसी सीमा की, यह सबकी है और यह सबके लिए है.

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