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झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिशें तेज, पर अभी भी सामने हैं कई चुनौतियां

रांचीः झारखंड में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और वर्षों से चली आ रही मैनपावर की कमी को दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 2025 में राज्य सरकार ने कई महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम उठाए हैं. इन पहलों का मकसद केवल शिक्षकों की संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना, छात्रों को आधुनिक संसाधनों से जोड़ना और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना भी है. हालांकि, इन सकारात्मक प्रयासों के बावजूद यह सच्चाई भी सामने है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था अब भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है. खासकर उच्च शिक्षा और माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों और कर्मचारियों की भारी कमी को लेकर.

शिक्षक भर्ती: राहत जरूर, लेकिन जरूरत कहीं अधिक

झारखंड की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी और पुरानी समस्या शिक्षकों की कमी रही है. सरकारी स्कूलों में वर्षों से हजारों पद खाली पड़े हैं, जिसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, परीक्षा परिणाम और शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ा है. इस चुनौती को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2025 में लगभग 11,000 शिक्षकों की नियुक्ति की. जिससे प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में कुछ हद तक राहत मिली है. इसके साथ ही 2026 में 40,000 सहायक आचार्यों की भर्ती की घोषणा की गई है, जिसमें 26,001 सहायक आचार्य शामिल हैं. यह फैसला निश्चित रूप से ऐतिहासिक माना जा रहा है, लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संख्या भी राज्य की वास्तविक जरूरतों के मुकाबले कम है, क्योंकि हाई स्कूल से लेकर मिडिल स्कूल तक अब भी सैकड़ों विद्यालय एकल शिक्षक या सीमित स्टाफ के सहारे चल रहे हैं.

हाई स्कूल और मिडिल स्कूल में सबसे गंभीर स्थिति

राज्य के कई जिलों में हाई स्कूल और मिडिल स्कूलों में विषयवार शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं. गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे विषयों के शिक्षक वर्षों से पदस्थापित नहीं हुए हैं. कई स्कूलों में एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है. इसका असर बच्चों की बुनियादी समझ और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर साफ दिख रहा है.

डिजिटल शिक्षा: विकल्प बना, समाधान नहीं

डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में ‘झारखंड एजुकेशन ग्रिड’ के तहत सरकार ने सराहनीय पहल की है. स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन कंटेंट और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म के जरिए छात्रों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा जा रहा है. खासकर ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों के छात्रों को इससे लाभ भी मिल रहा है. हालांकि, यह भी सच है कि डिजिटल शिक्षा शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकती. जहां प्रशिक्षित शिक्षक ही नहीं हैं, वहां केवल डिजिटल माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

उच्च शिक्षा: सबसे कमजोर कड़ी

झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है. राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की भारी कमी है. कई विभाग वर्षों से अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं. नियमित नियुक्तियां लंबे समय से नहीं हुई हैं. जिससे शोध, अकादमिक गुणवत्ता और छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है. सरकार ने मुक्त विश्वविद्यालय और जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव जरूर दिया है, लेकिन मौजूदा विश्वविद्यालयों में मैनपावर की कमी को दूर किए बिना उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार संभव नहीं माना जा रहा.

बढ़ता बजट, लेकिन जमीनी चुनौतियां

वर्ष 2025-26 में शिक्षा बजट को बढ़ाकर 17,607 रुपये करोड़ से अधिक किया गया है, जो सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है. यह बजट बुनियादी ढांचे, डिजिटल संसाधनों और छात्र कल्याण योजनाओं पर खर्च किया जा रहा है, लेकिन शिक्षाविदों का कहना है कि जब तक इस बजट का बड़ा हिस्सा नियमित शिक्षक नियुक्ति, विश्वविद्यालयों में फैकल्टी और स्कूलों में सपोर्ट स्टाफ पर खर्च नहीं होगा, तब तक सुधार अधूरा रहेगा. छात्रों के लिए वित्तीय सहायता‘गुरुजी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना’ के तहत 15 लाख रुपये तक का शिक्षा ऋण छात्रों के लिए एक बड़ी राहत है. छात्रवृत्ति योजनाओं के विस्तार से भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को सहारा मिला है, लेकिन बिना पर्याप्त शिक्षक और मजबूत संस्थागत ढांचे के केवल वित्तीय सहायता से शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकती.

स्थानीय भाषाएं और प्रशिक्षण

स्थानीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा और समग्र शिक्षा योजना के तहत शिक्षक प्रशिक्षण सराहनीय कदम है, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या सीमित होने से इन योजनाओं का पूरा लाभ अभी नहीं मिल पा रहा है.

कुल मिलाकर झारखंड सरकार ने 2025-26 में शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल की है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. जब तक नियमित नियुक्तियां, विश्वविद्यालयों में फैकल्टी बहाली और स्कूलों में विषयवार शिक्षक उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक शिक्षा सुधार का लक्ष्य अधूरा रहेगा. अब जरूरत है कि नीतियों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर ठोस पहल करने की, ताकि झारखंड की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में मजबूत बन सके.

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