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मध्यप्रदेश

पहाड़ जैसा हौसला! मिलिए उस ‘Red Rice Lady’ से जिसने बंजर जमीन पर उगाया सोना, आज पूरी दुनिया मान रही है इनके श्री अन्न का लोहा

भोपाल: उत्तरकाशी में पहाड़ पर बसे नौगांव की रहने वाली स्वतंत्री बंधानी को रसोई की थाली ने ऐसा रास्ता दिखाया कि उन्होंने पहाड़ों की जमीनों पर उगने वाले अनाज की सूरत बदल दी. स्वतंत्री कहती हैं मैं रोज थाली देखती और उदास हो जाती थी कि हमारी थाली में मोटे अनाज के वो सारे व्यंजन धीरे-धीरे हटते जा रहे. जो मेरे दादी नानी बनाती थी. थाली से गायब हुए श्रीअन्न की तलाश ही उन्हें उन खेतों तक ले गई. जहां पहाड़ों पर किसान पारंपरिक खेती से किनारा कर रहे थे.

स्वतंत्र बंधानी ने पहाड़ों की रसोई से लेकर थाली तक में श्री अन्न को लौटाने की ऐसी मुहिम छेड़ी कि आज 10 हजार से ज्यादा किसानों के खेतों में मोटे अनाज की पैदावार शुरु हो चुकी है. अब पहाड़ों के दुर्लभ हो चुके चीणा कोणी के बीज स्वतंत्री जुटा रही हैं. उन्हें गांव-गांव किसानों तक पहुंचा रही हैं. पहाड़ से हौसले की इस कहानी में लोगों के घर सेहत के बीज पहुंचाने की जिद और जुनून है. पहाड़ों के लाल चावल को बचाने से लेकर उगाने और उसे बाजार तक पहुंचाने में बीते 10 साल की स्वतंत्री की मेहनत का रंग है ये कि उन्हें भारत की रेड राइस लेडी का खिताब दे दिया गया.

पहले जानिए थाली से गुम हुए अनाज कैसे करामाती

स्वतंत्री बंधानी बताती हैं “पहाड़ों में लोग सालों बीमार नहीं पड़ते थे. बड़ी बीमारी की तो बात ही छोड़ दीजिए. उसकी वजह क्या ये मोटा अनाज ही था. जिसकी हमने कद्र नहीं की. वो अपने हाथों से बने हुए मंडुवे यानि कोदू के लड्डूओं को दिखाते हुए कहती हैं. शुगर फ्री अब चला है, लेकिन हमारे मंडुवे शुरू से शुगर फ्री हैं और कहने भर को नहीं है, अगर ये आपने नियमित खा लिए तो डायबिटीज हो ही नहीं सकती. इतना ही नहीं ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल रहता है.

इसके अंदर इतना फाईबर है कि तीन रोटी बराबर का एक लड्डू है. वे आगे कहती हैं तो जो मोटा अनाज हमें ताकत दे रहा था, जो हमें सेहत दे रहा था उसे ही थाली से रवाना कर दिया, क्योंकि किसानों के कैश क्राप चाहिए थी. किसानों ने ये देखा ही नहीं कि अपनी जमीन की पैदावार बदल कर वो कितना नुकसान कर रहे हैं. मुझे लगा कि थाली से पहले रसोई और रसोई से पहले जमीन पर इस अनाज को लौटा लाने की जरुरत है. स्वतंत्र बंधानी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के श्रीअन्न पर केन्द्रित राष्ट्रीय श्री अन्न महोत्सव में हिस्सा लेने भोपाल पहुंची हैं.

थाली से पहले जमीन में श्री अन्न लौटाने ऐसे छे़ड़ा अभियान

पहाड़ों पर रहने वाली महिला का हौसला भी पहाड़ों सा ऊंचा और हिम्मत भी. श्री अन्न को रसोई तक लाने घर से निकली स्वतंत्री देवी ने उत्तराखंड के किसानों को एकजुट किया. फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन शुरू किया. इसमें लाल धान उत्पादक महिला पुरुष किसानों के सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाए गए. इसमें उत्पादन प्रोसेसिंग और फिर मार्केटिंग इन तीन चरणों में श्री अन्न का काम शुरू किया. स्वतंत्री कहती हैं, सरकार की भी मदद मिली. फार्मर क्लब बनाए गए.

सिस्टम टू राइज श्री विधि तकनीक से प्रोसेसिंग होती है, जो पूरी तरह आर्गेनिक है. हमने फिर आउटलेट शुरु किए. ऑनलाइन दुनिया के किसी हिस्से में आप मिलेट्स बुलवा सकते हैं. बाकी लोग तो आते ही हैं. मेरे खेतों का मिलेट्स स्कॉटलैण्ड तक गया है. वे आगे जोड़ती है, आज मेहनत रंग लाई तो 10 हजार से ज्यादा किसान श्री अन्न उगा रहे हैं. प्रोसेसिंग के बाद जिसकी मार्केटिंग भी हमारा समूह ही संभाले हुए है.

दुर्लभ हो चुके चीणा कोणी के ऐसे बचाए बीज

स्वतंत्री देवी कहती हैं, अब भी कई ऐसे दुर्लभ श्री अन्न हैं, जो लगभग हमारे यहां खत्म हो चुका है. जैसे चीणा कोणी मैंने हिमचाल से इसके बीज मंगाए. चमोली से बुलवाए और इन्हें लगाया, फिर बीज बनाया और मैंने भले बीज खरीदे हो, लेकिन उनसे नए बीज बनाकर अब मैं मुफ्त में किासनों को बांट रही हूं, ताकि वो अपने खेतों में इन्हें लगा सकें.

गरीब का अनाज कहा जाता था ये श्री अन्न

इस श्री अन्न को कभी गरीबों का अनाज कहा जाता था. स्वतंत्री कहती हैं लेकिन ये ताकतवर होता था, इसलिए पहले हमारे पहाड़ों में इसे खासतौर पर बहुओं को खिलाया जाता था. ताकि उनकी ताकत बनी रहे. अब देखिए तो श्री जुड़ जाने के बाद इसकी सबसे ज्यादा डिमांड है.”

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