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इजराइल के ‘आयरन डोम’ पर संकट! ईरान की मिसाइलों ने खाली किए गोदाम; इंटरसेप्टर की कमी से बढ़ी नेतन्याहू की टेंशन, क्या फेल होगा सुरक्षा कवच?

इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध लगातार तेज होता जा रहा है. दोनों देशों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमले जारी हैं. इसी बीच जानकारी के मुताबिक इजरायल के पास बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर तेजी से कम हो रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि ईरान के लगातार हमलों की वजह से इजरायल की एयर डिफेंस प्रणाली पर भारी दबाव पड़ रहा है. खास तौर पर आयरन डोम और अन्य लंबी दूरी की रक्षा प्रणालियों को लगातार एक्टिव रहना पड़ रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार इजराइल के पास युद्ध शुरू होने से पहले ही इंटरसेप्टर की संख्या सीमित थी. पिछले साल हुए संघर्ष में भी इनका काफी इस्तेमाल हो चुका था. अब मौजूदा युद्ध में ईरान लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, जिससे इजरायल के रक्षा तंत्र पर अतिरिक्त दबाव बन गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ईरान कुछ मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन का इस्तेमाल कर रहा है. इनमें एक मिसाइल के अंदर कई छोटे-छोटे बम होते हैं, जो हवा में फटकर बड़े इलाके में फैल जाते हैं. इससे उन्हें रोकना और भी मुश्किल हो जाता है.

अमेरिकी अधिकारियों का बयान

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक उन्हें पहले से अंदेशा था कि इजरायल के इंटरसेप्टर कम पड़ सकते हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि United States के पास अपने इंटरसेप्टर और हथियारों की कमी नहीं है और उसकी सैन्य क्षमता अभी भी मजबूत है. अमेरिका ने यह भी कहा कि क्षेत्र में मौजूद अपने सैन्य ठिकानों और सैनिकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त हथियार उसके पास मौजूद हैं.

इजराइल के पास क्या विकल्प

इजराइल के पास मिसाइल हमलों से बचाव के अन्य तरीके भी हैं. जरूरत पड़ने पर वह लड़ाकू विमानों और दूसरी एयर डिफेंस प्रणालियों का इस्तेमाल कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने इजरायल को करीब 12,000 बम बेचने की मंजूरी भी दे दी है. यह फैसला आपात स्थिति बताते हुए अमेरिकी प्रशासन ने लिया है.

इसके अलावा पिछले संघर्ष के दौरान अमेरिका ने THAAD और Patriot missile system जैसे इंटरसेप्टर भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए थे. ईरान के लगातार मिसाइल हमलों से इजराइल की एयर डिफेंस प्रणाली पर दबाव बढ़ता दिख रहा है. अगर युद्ध लंबे समय तक चलता है तो इंटरसेप्टर की उपलब्धता और सैन्य संसाधनों को लेकर चुनौतियां और बढ़ सकती हैं.

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