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Sugar Factory Failure: करोड़ों की लागत और नतीजा शून्य! ‘सफेद हाथी’ बना ये शक्कर कारखाना, पेराई के आंकड़ों ने उड़ाए होश

बालोद : छत्तीसगढ़ में औद्योगिक नीतियों पर चर्चा हो रही है. उद्योग लगातार विकास कर रहे हैं लेकिन बालोद जिले में उद्योगों का जब जिक्र होता है तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. बालोद जिले में एक मात्र मां दंतेश्वरी सहकारी शक्कर कारखाना स्थापित किया गया.लेकिन इसकी स्थापना के बाद से ही ये कारखाना सिर्फ सफेद हाथी बना हुआ है.इस कारखाने की पेराई क्षमता 2 लाख मीट्रिक टन है.बावजूद इसके इस आंकड़े को कारखाना छू तक नहीं सका है.

सालाना लक्ष्य का आधा ही संभव
मां दंतेश्वरी सहकारी शक्कर कारखाने के महाप्रबंधक लिलेश्वर देवांगन ने बताया कि इस सत्र में 64 हजार मीट्रिक टन पेराई का लक्ष्य था .लेकिन 36 हजार मीट्रिक टन गन्ने की पेराई ही हो सकी.इसका मतलब ये है कि जितना लक्ष्य था उसके आधे से भी ज्यादा मात्रा की गन्ना पेराई ही संभव हो सकी.जब इस बारे में महाप्रबंधक से पूछा गया तो उन्होंने इसका कारण गुड़ की कीमतों में इजाफा होना बताया.इसकी वजह से दूसरे जिलों से जो गन्ना बालोद आना था वो नहीं आ सका.

अब किसानों को रिझाने नया जुगाड़

गन्ना उत्पादन को लेकर तो अब तक असफलता ही हाथ लगी है लेकिन अब किसानों को रिझाने प्रबंधन नया जुगाड़ लगा रहा है. आपको बता दें इससे पहले भी कारखाना के कुशल संचालन के लिए जिला खनिज संस्थान न्यास मद से लाखों करोड़ों रुपए फूंक दिए गए लेकिन परिणाम शून्य ही निकला है. अब किसानों को गन्ना उत्पादन के लिए खेत तैयारी के लिए 2 हजार प्रति एकड़ देने की घोषणा की गई है. वहीं बीज में 90 प्रतिशत अनुदान जिसमें 5 रुपए का पौधा एक रुपए में दिया जा रहा है. नए किस्म का पौधा महाराष्ट्र से मंगवाया जा रहा है.इसे काफी उन्नत किस्म का माना जा रहा है.

विफलता का कारण

प्रबंधन का तर्क है कि बाजार में गुड़ की कीमतों में अचानक आई तेजी के कारण किसानों ने कारखाने को गन्ना देने के बजाय बाहर बेचना मुनासिब समझा. इसी वजह से दूसरे जिलों से आने वाली गन्ने की खेप बालोद नहीं पहुंच सकी. आपको बता दें शक्कर कारखाना के संचालन के लिए 2 लाख मीट्रिक टन गन्ने की जरूरत होती है जहां वर्तमान में 30 हजार मीट्रिक टन की आपूर्ति मात्र हो पा रही है. वहीं इस वर्ष अन्य जिलों से 6 हजार मीट्रिक टन गन्ने का आवक हुआ. यदि इसे मिलाया जाए तो 36 हजार मीट्रिक टन गन्ना ही कारखाने तक पहुंचा.

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