Supreme Court Verdict: चुनाव आयोग के पास है वोटर लिस्ट में SIR कराने का पूरा अधिकार; SC ने याचिकाएं खारिज कीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर अपना महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वोटर लिस्ट में सुधार और संशोधन करने की व्यापक शक्तियां हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि वोटर लिस्ट की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की असली नींव है।
🗳️ निष्पक्ष चुनाव के लिए अनिवार्य है वोटर लिस्ट की शुद्धता
कोर्ट ने अपने फैसले में चुनाव आयोग के तर्कों का समर्थन करते हुए कहा कि बिहार में आखिरी गहन संशोधन के बाद से चार दशकों का समय बीत चुका था। तीव्र शहरीकरण, प्रवासन (Migration) और वोटर लिस्ट में पुनरावृत्ति (Repetition) जैसी समस्याओं को देखते हुए SIR का अभ्यास बेहद जरूरी था। कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र चुनाव केवल मतदान प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं, और SIR का उद्देश्य इसी संवैधानिक लक्ष्य को पूरा करना है।
📜 ‘NRC जैसी प्रक्रिया’ के आरोपों को किया खारिज
याचिकाकर्ताओं (जिनमें ADR भी शामिल था) ने इस प्रक्रिया को “NRC जैसी” बताते हुए चुनाव आयोग की नागरिकता जांचने की शक्ति पर सवाल उठाए थे। वकील प्रशांत भूषण ने 65 लाख वोटर्स के नामों को हटाने की प्रक्रिया और समयसीमा पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को मान्य किया कि वोटर लिस्ट को अपडेट रखना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। कोर्ट ने दोहराया कि वोटर ID या अन्य दस्तावेज नागरिकता के ‘पुख्ता सबूत’ नहीं होते, इसलिए लिस्ट की नियमित समीक्षा आवश्यक है।
✅ लोकतांत्रिक प्रक्रिया की दिशा में बड़ा कदम
पिछले साल 12 अगस्त से शुरू हुई इस कानूनी बहस में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र को बरकरार रखा है। बिहार में SIR का पहला चरण पहले ही पूरा किया जा चुका है। कोर्ट के इस फैसले से अब चुनाव आयोग के लिए आगे भी वोटर लिस्ट की शुद्धि और पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया को लागू करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।






