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मध्यप्रदेश

MP Police Suicide Case: मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों में बढ़ रहा तनाव; 12 दिनों में 5 जवानों ने की आत्महत्या

ग्वालियर/भोपाल: मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में आत्महत्या की घटनाओं ने पूरे महकमे और शासन को झकझोर कर रख दिया है। महज 12 दिनों के भीतर 5 पुलिसकर्मियों द्वारा आत्मघाती कदम उठाए जाने की घटनाओं ने पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य, ड्यूटी के भारी दबाव और कार्य-जीवन के संतुलन पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला ग्वालियर के डबरा का है, जहाँ आरक्षक राघवेंद्र तोमर ने अपने आवास पर फांसी लगाकर जान दे दी।

📞 वीडियो कॉल के बाद उठाया खौफनाक कदम

डबरा सिटी थाने में पदस्थ आरक्षक राघवेंद्र तोमर ने शुक्रवार रात फांसी लगाने से पहले अपनी पत्नी को वीडियो कॉल किया था। कॉल के दौरान उन्होंने पत्नी को ‘बाय-बाय’ कहा और फोन काट दिया। जब उनके भाई ने फोन पर संपर्क करने की कोशिश की और जवाब नहीं मिला, तो आरक्षक मिंटू परिहार ने मौके पर जाकर देखा, जहाँ राघवेंद्र का शव फंदे पर लटका मिला। दो छोटे बच्चों के पिता राघवेंद्र को अनुकंपा नियुक्ति मिली थी।

📉 लगातार बढ़ती घटनाओं का सिलसिला

मध्य प्रदेश पुलिस में पिछले कुछ दिनों में हुई अन्य दर्दनाक घटनाएं:

  • मंडला (8 जून): आरक्षक सुनील सरयाम ने ब्लैकमेलिंग से तंग आकर जान दी।

  • गुना (9 जून): महिला आरक्षक निशा शर्मा ने पुलिस क्वार्टर में फांसी लगाई।

  • छिंदवाड़ा (3 जून): प्रधान आरक्षक दीपा नेगी का जली हुई अवस्था में शव मिला, वह अवसाद का इलाज करा रही थीं।

  • उमरिया (31 मई): सब-इंस्पेक्टर विजय सिंह कोल ने सर्विस रिवॉल्वर से खुद को गोली मारी।

🧠 काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य की बढ़ती जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस की नौकरी में ड्यूटी के घंटों का कोई निश्चित समय न होना, अत्यधिक काम का दबाव, पारिवारिक दूरियां और निजी विवाद पुलिसकर्मियों को अवसाद (Depression) की ओर धकेल रहे हैं। इन घटनाओं के बाद अब विभाग के भीतर नियमित ‘काउंसलिंग सत्र’ और तनाव प्रबंधन प्रशिक्षण (Stress Management Training) को अनिवार्य बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत दुखांत है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी भी है।

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