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झारखण्ड

CIMFR Innovation: कोयला खदानों के कचरे से अब बनेंगे सड़क और पुल; सिंफर वैज्ञानिक की बड़ी खोज

धनबाद: निर्माण उद्योग में प्राकृतिक पत्थरों (स्टोन चिप्स) की भारी मांग और इसके कारण बढ़ते पर्यावरणीय संकट को देखते हुए, धनबाद स्थित सिंफर (CIMFR) के वैज्ञानिक डॉ. मुस्ताक अंसारी ने एक शानदार समाधान खोज निकाला है। चार वर्षों के निरंतर शोध के बाद, उन्होंने यह साबित कर दिया है कि कोयला खदानों से निकलने वाले ‘हार्ड रॉक ओवरबर्डन’ (खनन अपशिष्ट) का उपयोग कंक्रीट निर्माण में सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

🔬 चार वर्षों का शोध और अद्भुत परिणाम

डॉ. अंसारी ने सैकड़ों प्रयोगों के जरिए यह पाया कि खनन के दौरान निकलने वाले पत्थरों को क्रश करके जब कंक्रीट में मिलाया जाता है, तो इसकी मजबूती (कम्प्रेसिव और टेंसाइल स्ट्रेंथ) पारंपरिक कंक्रीट के बिल्कुल बराबर होती है। परीक्षणों में इसकी ड्यूरेबिलिटी और वर्केबिलिटी भी पूरी तरह संतोषजनक पाई गई है। यह तकनीक अब भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में पत्थरों के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जा सकेगी।

💰 निर्माण लागत में 18% तक की बचत

इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू यह है कि ओवरबर्डन एग्रीगेट तैयार करने की लागत, प्राकृतिक स्टोन चिप्स की तुलना में लगभग 65 प्रतिशत कम है। M30 ग्रेड कंक्रीट के निर्माण में कुल लागत में लगभग 18 प्रतिशत तक की बचत संभव है। यदि इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाए, तो भारत सरकार सड़क और पुल निर्माण में करोड़ों रुपये बचा सकती है।

🌍 पर्यावरण संरक्षण में मील का पत्थर

प्राकृतिक पत्थरों के लिए होने वाली अंधाधुंध खुदाई से पहाड़ खत्म हो रहे हैं और नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। इस शोध के जरिए:

  • प्रति टन ओवरबर्डन का उपयोग, एक टन प्राकृतिक पत्थर के खनन को रोकेगा।

  • वनों की कटाई और जैव विविधता पर पड़ने वाला दबाव कम होगा।

  • खनन कंपनियों की ‘डंपिंग’ समस्या खत्म होगी और कचरा एक बहुमूल्य संसाधन में बदल जाएगा।

🚀 ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में बढ़ते कदम

डॉ. मुस्ताक अंसारी की इस खोज को अब पेटेंट कराने की प्रक्रिया जारी है। बेंगलुरु सहित कई कंपनियां इसके व्यावसायिक उत्पादन में रुचि दिखा रही हैं। कोयला उत्पादक राज्यों जैसे झारखंड, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक का व्यापक उपयोग होता है, तो भारत निर्माण सामग्री की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) के लक्ष्यों को भी आसानी से प्राप्त कर सकेगा।

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