RSS Chief Mohan Bhagwat: अतिवाद से परेशान है दुनिया, भारत के पास है ज्ञान का खजाना; अखिल भारतीय विहार सेवा समूह में बोले संघ प्रमुख

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें वार्षिक सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में सहभागिता की।
सभा को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख ने वैश्विक परिदृश्य और मानवीय संवेदनाओं पर गहन विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि सांसारिक जीवन में हर खुशी कहीं न कहीं अधूरी रह जाती है और प्रत्येक आकांक्षा के साथ किसी न किसी प्रकार का नुकसान जुड़ा होता है। आज के समय में निष्ठाएं एक-दूसरे से टकरा रही हैं, चारों तरफ अतिवाद है, संतुलन का अभाव है और कोई बीच का रास्ता नहीं खोज पा रहा है; यही कारण है कि आज पूरी दुनिया अशांत और परेशान है।
🕊️️ 3,000 वर्षों तक भारत ने दिखाया शांति का मार्ग: ‘बिना धर्म बदले और बिना हमला किए दी दिशा’
वैश्विक शांति में भारत के ऐतिहासिक योगदान पर मोहन भागवत का दृष्टिकोण:
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विश्व को भारत से राह की उम्मीद: उन्होंने कहा कि संपूर्ण विश्व इस बात से भली-भांति परिचित है कि वर्तमान संकटों से उबरने का मार्ग केवल भारत से ही निकल सकता है।
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अहिंसा और शांति का गौरवशाली इतिहास: लगभग 3,000 वर्षों की लंबी अवधि तक भारत ने किसी भी देश पर सैन्य विजय प्राप्त किए बिना, किसी का जबरन धर्म परिवर्तन कराए बिना और किसी पर आक्रमण किए बिना दुनिया को सच्चे सुख और शांति का मार्ग दिखाया।
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वैश्विक अपेक्षाओं का केंद्र: यही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है जिसके कारण आज संपूर्ण विश्व समुदाय भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है।
✨ नेक और दिव्य लक्ष्य के प्रति समर्पण: जीवन को स्वर्ग बना सकता है सार्थक कार्य
समर्पण, कर्म और आध्यात्मिक मूल्यों का महत्व:
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दिव्य उद्देश्य की शक्ति: मोहन भागवत ने रेखांकित किया कि यदि किसी व्यक्ति का समर्पण किसी नेक, पवित्र और ईश्वरीय उद्देश्य के प्रति हो, तो वह उसके जीवन को स्वर्ग के समान आनंदमय बना सकता है।
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सार्थक अवसर का मिलना सौभाग्य: उन्होंने सेवाभावी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वे अत्यंत भाग्यशाली हैं कि उन्हें समाज सेवा और धर्म के ऐसे पावन कार्य के लिए खुद को समर्पित करने का अवसर प्राप्त हुआ है।
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पुण्य और तपस्या का फल: उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसे सार्थक और पवित्र कार्य करने का अवसर प्राप्त करने के लिए कई जन्मों तक निरंतर तपस्या करनी पड़ती है, जो संभवतः पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों का ही परिणाम है।
📖 भारत का अगाध ज्ञान भंडार: वेद, उपनिषद और संतों की परंपरा का संरक्षण मानवता की सेवा
भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का उल्लेख:
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समृद्ध ग्रंथों की विरासत: अपने संबोधन में उन्होंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और महान संतों की अमर शिक्षाओं का विशेष उल्लेख किया।
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विश्व को भारतीय ज्ञान की आवश्यकता: उन्होंने कहा कि भारत के पास आध्यात्मिक और व्यावहारिक ज्ञान का एक अतुलनीय खजाना है, जिसकी आज के भौतिकतावादी विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है।
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भक्ति और सेवा का संगम: संघ प्रमुख ने कहा कि सच्ची भक्ति की शक्ति से ही परमात्मा के समीप पहुंचा जा सकता है। इस सनातन ज्ञान और परंपराओं को सुरक्षित व संरक्षित रखना केवल एक धार्मिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की सच्ची सेवा है।





