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झारखण्ड

Shibu Soren Memorial Connection: झारखंड आंदोलन की गवाह रही बरवाअड्डा की दीवारें, रूपी सोरेन के निधन पर पसरा सन्नाटा

धनबाद के बरवाअड्डा स्थित बरवाटोला में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की माता रूपी सोरेन के निधन के बाद पूरे इलाके और उनके पुराने परिचितों में गहरा शोक व्याप्त है। बरवाटोला का यह घर कोई आम घर नहीं है, बल्कि इसका सीधा रिश्ता झारखंड आंदोलन के शुरुआती संघर्षों और शिबू सोरेन के महाजनी प्रथा के खिलाफ चलाए गए ऐतिहासिक अभियानों से जुड़ा रहा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, 1970 के दशक में शिबू सोरेन अपनी पत्नी रूपी सोरेन के साथ इस घर में अक्सर आया करते थे। यह आवास उनके लिए केवल ठहरने का ठिकाना नहीं, बल्कि आंदोलन की रणनीति तैयार करने का मुख्य केंद्र हुआ करता था। परिवार का संस्मरण है कि लगभग आठ से नौ वर्षों तक उनका यहाँ लगातार आना-जाना रहा।

🏛️ दीवारों में आज भी बसी हैं झारखंड आंदोलन की अनकही यादें

स्थानीय निवासी और परिवार के सदस्य गोपीकांत सोरेन बताते हैं कि उनके पिता स्व. ठाकुर दास सोरेन (जो डीजीएमएस में कार्यरत थे) के घर पर शिबू सोरेन, रूपी सोरेन, विनोद बिहारी महतो और एके राय जैसे दिग्गज नेता आंदोलन की रूपरेखा तय करने के लिए जुटते थे। उस दौर में रूपी सोरेन यहाँ 10 से 15 दिनों तक ठहरती थीं और उन्हें घर के एक सदस्य की तरह आत्मीयता मिलती थी। परिवार के अन्य सदस्यों ने साझा किया कि रूपी सोरेन को भतुआ का साग बेहद पसंद था और वे घरेलू महिलाओं से इसे बनवाने का आग्रह करती थीं। आज उनके निधन के बाद ये छोटी-छोटी स्मृतियाँ और पुरानी आत्मीयता के किस्से परिवार की आंखें नम कर रहे हैं।

🤝 आम जन के सहयोग और समर्पण का प्रतीक था वह दौर

परिवार के सदस्यों का मानना है कि झारखंड आंदोलन किसी एक व्यक्ति के बलबूते पर सफल नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे उन तमाम ग्रामीण परिवारों और स्थानीय लोगों का बड़ा योगदान था जिन्होंने अपनी गृहस्थी से निकालकर आंदोलनकारियों को आश्रय और भोजन दिया। बरवाटोला का यह ऐतिहासिक घर आज भले ही बदल चुका है, लेकिन इसके कण-कण में झारखंड के उस सुनहरे और संघर्षपूर्ण अतीत की गंध आज भी जीवित है। रूपी सोरेन के जाने से आंदोलन के उस दौर का एक और अहम अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है।

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