ब्रेकिंग
Shiva Sharma Death Case: लखनऊ के कैफे संचालक शिवा शर्मा संदिग्ध मौत मामले में बड़ा खुलासा, मॉडल श्रद... Bulandshahr ADM Judicial Death: बुलंदशहर के एडीएम न्यायिक भारत राम यादव का निधन, हार्ट अटैक और ब्रेन... IND-W vs ZIM-W 3rd T20: भारत ने जिम्बाब्वे को 92 रनों से रौंदा, सीरीज पर 3-0 से कब्जा— हरमनप्रीत कौर... Salman Khan Security Increased: टाइगर श्रॉफ पर हमले के खुलासे के बाद सलमान खान की सुरक्षा सख्त, गैले... Saudi Arabia Death Penalty: सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को दी गई फांसी, मक्का की मस्जिद में... SBI Data Leak Alert: भारतीय स्टेट बैंक के ग्राहकों का पर्सनल डेटा डार्क वेब पर लीक, मोबाइल नंबर और ए... Smart Gadgets for Daily Habits: बुरी आदतें छुड़ाने और लाइफस्टाइल सुधारने में मदद करेंगे ये 5 अनोखे ग... Karwa Chauth Vrat Rules: करवा चौथ पर चांद देखने के बाद कैसे खोलें व्रत? जानें चंद्रमा को अर्घ्य देने... Diabetes Diet Tips: डायबिटीज में ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये हेल्दी डाइट, एक्सपर्ट्स ने ... Cockroach Janata Party News: जेल में बंद CJP नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका की रिहाई की मांग, अभिजी...
देश

Andolan Aur Chunavi Rajniti: आंदोलन से निकले चेहरे क्या राजनीति में दिखाते हैं कमाल? जानिए जेपी आंदोलन से किसान आंदोलन तक का सफर

आंदोलन की ताकत हमेशा भीड़ और उसके तेवर से आंकी जाती है. दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान हों, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर-मंतर पर जुटे लोग हों या फिर आरक्षण की मांग पर सड़कों पर उतरे नौजवान, भीड़ ने हमेशा सरकारों को चुनौती दी है, कुछ फैसले बदले हैं और कुछ चेहरों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है. अखबारों में तस्वीरें छपी हैं, टीवी की बहसों में जगह मिली है और सोशल मीडिया में वे चर्चा के केंद्र बने हैं. लेकिन आंदोलन की तपिश उतरने के बाद हमेशा यह सवाल सामने आता है कि जो चेहरा लाखों लोगों की आवाज बन गया था, वह चुनावों में कितना कमाल दिखा पाया? इन दिनों जैसे नेहा बोरा काफी चर्चित हैं और राहुल गांधी उन्हें काफी तरजीह देते दिख रहे हैं, वैसे ही कन्हैया कुमार को भी याद किया जा सकता है जो एक समय मीडिया की सुर्खियों में थे, लेकिन दो चुनाव लड़ने के बाद भी संसद तक नहीं पहुंच सके. भारतीय राजनीति में ऐसे चेहरों की एक लंबी सूची है, जो किसी न किसी आंदोलन से निकले, रातोंरात राष्ट्रीय पहचान बनाई, सरकारों को चुनौती दी और फिर चुनावी राजनीति में उतरे. इनमें से कुछ मुख्यमंत्री बने, कुछ सांसद बने, कुछ ने अपनी पार्टी बनाई तो कुछ स्थापित दलों में चले गए, जबकि कुछ की पहचान केवल आंदोलन तक ही सिमट कर रह गई.

🏛️ जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन तक: कैसे बदल गए राजनीतिक रास्ते और मंजिलें

1974 का बिहार आंदोलन इस राजनीतिक कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय रहा है. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और सत्ता के तौर-तरीकों के खिलाफ शुरू हुआ वह छात्र आंदोलन देशव्यापी राजनीतिक चुनौती बन गया था. आपातकाल के बाद 1977 के चुनावों में आंदोलन से निकली एक पीढ़ी ने संसद और विधानसभाओं का रास्ता पकड़ा, जिसमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी प्रमुख चेहरे थे. रामविलास पासवान भी इसी दौर की आंदोलनकारी राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे. जेपी आंदोलन ने इन सभी नेताओं को एक साझा राजनीतिक अनुभव तो जरूर दिया, लेकिन आगे का रास्ता किसी एक आंदोलन ने तय नहीं किया. लालू ने अपना दल बनाया, नीतीश ने गठबंधन की राजनीति की, सुशील मोदी भाजपा में आगे बढ़े और पासवान ने अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार की. इसी तरह 2011 का भ्रष्टाचार-विरोधी अन्ना आंदोलन भी एक बड़ा मोड़ साबित हुआ, जिसके बाद अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली में लगातार सरकारें चलाईं, हालांकि बाद में राजनीतिक उतार-चढ़ाव भी देखने को मिले. इसी मंच से जुड़े योगेंद्र यादव, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरों की मंजिलें भी बिल्कुल अलग-अलग रहीं.

🗳️ कन्हैया कुमार और किसान नेता: क्या आंदोलन की लोकप्रियता चुनावी जीत की गारंटी है?

आंदोलनों के जरिए चर्चित हुए चेहरों का आगे का सफर और उनके हासिल की कहानियां हमेशा से अलग-रहती हैं. गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन से उभरे हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी ने अपनी पहचान को विधानसभा की राजनीति में जरूर बदला, लेकिन उन्हें भी अंततः स्थापित राजनीतिक दलों कासहारा लेना पड़ा. वहीं, जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार ने सीपीआई और फिर कांग्रेस के टिकट पर दो बड़े लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसी प्रकार, 2020-21 के किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे रहे राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढ़ूनी जब चुनावी मैदान में उतरे, तो उन्हें भारी अंतर से हार मिली और उनकी जमानत तक जब्त हो गई. इन तमाम उदाहरणों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि आंदोलनों के दौरान मिलने वाले नारे, आदर्श और चुनावी राजनीति दो बिल्कुल जुदा चीजें हैं. आंदोलन का चेहरा बने लोग जब चुनाव के मैदान में उतरते हैं, तो स्थानीय समीकरण, सोशल इंजीनियरिंग और प्रतिद्वंद्वी पार्टियों का वोट बैंक उनकी शोहरत पर भारी पड़ जाते हैं. सफलता अंततः उन्हीं को मिलती है जो वक्त रहते जनता की नब्ज को पहचान लेते हैं और खुद को उसके अनुकूल ढाल लेते हैं.

Related Articles

Back to top button