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India Water Crisis: बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक, देश के बड़े शहरों में गहरा रहा है पानी का गंभीर संकट; जानें मुख्य वजहें

नई दिल्ली: हाल के कुछ वर्षों की गर्मियों के दौरान देश के कई हिस्सों में भीषण जल संकट देखने को मिला है, जहां बेंगलुरु जैसे शहरों में निवासियों को पानी के एक-एक टैंकर के लिए निजी ट्रांसपोर्टर्स को भारी-भरकम रकम चुकानी पड़ी है। एक समय ऐसा था जब इस शहर में 260 से अधिक झीलें हुआ करती थीं, लेकिन आज इनमें से आधी से भी कम यानी करीब 80 से 81 झीलें ही बची हैं, जिनमें पानी मौजूद है। शहर के अधिकांश बोरवेल पूरी तरह सूख चुके हैं। इसी तरह, चारों तरफ समुद्र से घिरे मुंबई शहर को भी ऐसे दौर का सामना करना पड़ा है जब इसके मुख्य जलाशयों का जलस्तर कुल क्षमता के 9 से 10 प्रतिशत तक गिर गया था। दूसरी ओर, दिल्ली और उससे जुड़े एनसीआर क्षेत्र में लगभग 3.3 करोड़ लोगों की आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए आंशिक रूप से भूजल पर निर्भर है, जिसे आधिकारिक तौर पर 21 अलग-अलग क्षेत्रों में ‘गंभीर’ श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

देश के 21 बड़े शहरों में भूजल की स्थिति खतरनाक स्तर पर

सरकारी आंकड़ों और नीति आयोग के कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स के अनुसार, देश के कम से कम 21 बड़े शहरों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। स्थिति यह है कि आधिकारिक आकलनों के मुताबिक हैदराबाद की भूजल स्थिति देश के अन्य बड़े शहरों में सबसे खराब मानी गई है, जिसके 26 प्रशासनिक क्षेत्र अत्यधिक दोहित या गंभीर श्रेणी में आते हैं। यह कोई भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान समय की एक कड़वी सच्चाई है। यदि देश के भौगोलिक स्वरूप को देखें तो भारत प्राकृतिक रूप से उन रेगिस्तानी देशों की तरह नहीं है जहां पानी की भारी कमी हो, क्योंकि यहां हर साल मानसूनी बारिश अच्छी होती है। असल समस्या आसमान से गिरने वाली बारिश की मात्रा नहीं है, बल्कि उसके बाद उस जल के संरक्षण में बरती गई लापरवाही और उन पारंपरिक जल प्रणालियों को नष्ट करना है जो कभी पानी को संचित और रिचार्ज करती थीं।

झीलों के अतिक्रमण और अंधाधुंध दोहन से बिगड़े हालात

बेंगलुरु का उदाहरण लें तो वहां की झीलें प्राकृतिक कारणों से नहीं सूखी हैं, बल्कि उन्हें अपार्टमेंट परिसरों, विशाल टेक पार्कों और सड़कों के निर्माण के लिए पाट दिया गया। शहरी आबादी और रियल एस्टेट का विस्तार इतनी तेजी से हुआ कि उसके नीचे के जल संसाधनों की किसी ने सुध नहीं ली। एक झील केवल सतह पर पानी नहीं रखती, बल्कि वह आसपास के पूरे इलाके के भूजल को निरंतर पुनर्जीवित करती है। सैकड़ों झीलों के लुप्त होने से केवल ऊपरी पानी ही समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसने भूमिगत जल तंत्र को भी बुरी तरह तोड़ दिया। भूजल तब तक दिखाई नहीं देता जब तक वह पूरी तरह समाप्त न हो जाए, और जब तक बोरवेल हवा खींचना शुरू करता है, तब तक जलभृत दशकों के दोहन से पूरी तरह खाली हो चुका होता है।

शहरी जीवन की रोजमर्रा की चुनौती बन चुकी है पानी की किल्लत

आज के समय में शहरी भारतीय परिवारों के लिए पानी की यह कमी रोजमर्रा की जिंदगी का एक कड़वा हिस्सा बन गई है। कई परिवारों को पानी के लिए बिजली की तरह बजट बनाना पड़ता है, टैंकरों के आने का समय देखना पड़ता है और सूखे के दिनों में पानी की खपत को सीमित करना पड़ता है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी इसके परिणाम घातक साबित हो रहे हैं, क्योंकि अनुमान के मुताबिक देश में हर साल लाखों लोग दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियों जैसे टाइफाइड और पीलिया का शिकार होते हैं। हालांकि, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि भारतीय शहर हमेशा के लिए सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं। कुछ शहरों में झील पुनर्जीवन और अनिवार्य वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) जैसी पहलों ने सुधार की उम्मीद भी जगाई है।

भविष्य की तैयारियों और जवाबदेही तय करने की जरूरत

इन तमाम समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक है कि संकट सामने आने से बहुत पहले ठोस कदम उठाए जाएं। यह तय करना जरूरी है कि निर्माण कार्य कहां और कैसे हों, एक बोरवेल से कितना भूजल खींचा जा सके और प्राकृतिक झीलों को संरक्षित किया जाए। आम नागरिकों के लिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि क्या उनका शहर रातों-रात पानी से खाली हो जाएगा, बल्कि यह होना चाहिए कि पिछले एक दशक में उनके शहर का जलस्तर कितना गिरा है और इस दिशा में स्थानीय प्रशासन कितना जवाबदेह है।

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