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एक बार फिर डोला मांझी का मन, CM नीतीश से मिलकर NDA की ओर बढ़ाया कदम

पटना। हिंदुस्‍तानी अवाम मोर्चा (HAM) प्रमुख जीतनराम मांझी (Jitan Ram Manjhi) ने महागठबंधन (Grand Alliance) को झटका देने के पांच दिन बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से गुरुवार को पहली बार मुलाकात की। इसे मांझी का राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर पहला कदम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री से उनके आवास पर जाकर मुलाकात का संकेत यह भी है कि मांझी के लिए एनडीए का दरवाजा अब लगभग खुल गया है। मतलब भारतीय जनता पार्टी (BJP) को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। परस्पर सहमति बनने के बाद अब सीटों के बंटवारे पर बात आगे बढ़ सकती है। जीतनराम मांझी की राजनीति कभी स्थिर नहीं रही है। पिछले तीन दशक से कांग्रेस (Congress), राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) और जेडीयू के सहारे राजनीति में सक्रिय मांझी का मन फिर जेडीयू के लिए डोला है

एनडीए का दरवाजा खुला, सभी विकल्पों पर विचार

मुख्यमंत्री आवास से बाहर निकलने के बाद मांझी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह राजनीतिक मुलाकात नहीं थी। वे अपने क्षेत्र के मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री से मिलने गए थे। इस दौरान दोनों के बीच कोई राजनीतिक बात नहीं हुई। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि अगले एक-दो दिनों में जब मुलाकात होगी तब बाकी बातें भी होंगी। ‘हम’ के प्रवक्ता दानिश रिजवान ने कहा कि जब दो बड़े नेता मिलते हैं तो राजनीतिक बातों से इनकार नहीं किया जा सकता है। हमारे लिए एनडीए का दरवाजा खुला है। अभी सभी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। 30 अगस्त तक अपने अगले रुख के बारे में स्पष्ट करेंगे।

एनडीए में मांझी को मिल सकती हैं 12 से 15 सीटें

महागठबंधन में लगातार उपेक्षा से खिन्न मांझी ने 22 अगस्त को अपनी पार्टी की कार्यसमिति की बैठक करके अपना रास्ता अलग कर लिया था। आरजेडी समेत अन्य घटक दलों पर वह गरजने-बरसने भी लगे थे। तभी से माना जा रहा था कि वह एनडीए की ओर बढ़ने वाले हैं। गुरुवार की मुलाकात को सीटों के बंटवारे से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी सूत्रों का दावा है कि मांझी को 12 से 15 सीटें मिल सकती हैं। अधिसंख्य सीटें मगध प्रमंडल की हैं। सीटों पर समझौता दो तरीके से संभव है। एक तरीका मांझी की पार्टी को एनडीए में हिस्सेदार बनाकर उन्हें सम्मानजनक सीटें देने का है। दूसरा, जेडीयू में उनकी पार्टी का विलय कर विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों में उनके चहेतों को समायोजित करने का है।

कभी स्थिर नहीं रही मांझी की राजनीति

खास बात यह भी है कि जीतनराम मांझी की राजनीति कभी स्थिर नहीं रही है। पिछले तीन दशक से कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू के सहारे राजनीति में सक्रिय मांझी को जब हालात ने शीर्ष पर पहुंचाया, तब वहां भी उनका मन डोलता रहा। जेडीयू का साथ छोड़ा। मुख्यमंत्री की कुर्सी गई तो अपनी पार्टी बना ली। फिर भी मन चंचल बना रहा। कभी महागठबंधन तो कभी एनडीए के पल्लू से खेलते रहे। 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी रास आ रही थी। चुनाव खत्म हुआ। नतीजे अच्छे नहीं आए तो मन ऊब गया। लोकसभा चुनाव आते-आते मांझी ने फिर पाला बदला। बीजेपी से रिश्ता तोड़कर आरजेडी के साथ खड़े हो गए। लालू की कृपा से पुत्र संतोष मांझी को विधान पार्षद बनवा लिया। समय आगे बढ़ा। फिर लालू भी अच्छे नहीं लगने लगे। विधानसभा चुनाव करीब आ रहा था। नाव बीच मंझधार में थी। सहारा नजर नहीं आने लगा तो नीतीश कुमार से नजदीकियां बढ़ा लीं। 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री रहते हुए जिस जेडीयू से मांझी ने खुद को किनारा किया था, पांच वर्ष बीतते-बीतते उसी जेडीयू को पतवार बना लिया। फिलहाल बिहार की सियासत को मांझी के अगले कदम का इंतजार है।

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