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जीएसटी क्षतिपूर्ति फॉर्मूले पर 13 राज्यों की सहमति, 6 गैर-भाजपाई राज्य अब तक नहीं माने

नई दिल्ली। जीएसटी क्षतिपूर्ति को लेकर राजनीति खत्म होती नहीं दिख रही। जीएसटी संग्रह में हो रही कमी के मद्देनजर राज्यों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति राशि को लेकर प्रस्तावित फॉर्मूलों पर कोई भी विपक्षी दल वाली राज्य सरकार तैयार नहीं है। अभी तक 13 राज्यों ने वित्त मंत्रालय की तरफ से प्रस्तावित फॉर्मूलों पर सहमति जताई है। ये सभी राज्य भाजपा शासित हैं या यहां एनडीए से करीबी रिश्ता रखने वाली राज्य सरकारें हैं।

आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और ओडिशा ने क्षतिपूर्ति फॉर्मूले के पहले विकल्प का चुनाव किया है। मणिपुर ने दूसरा विकल्प चुना है। सूत्रों के मुताबिक, गोवा, असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम और हिमाचल प्रदेश एक-दो दिन में अपना चुनाव बता सकते हैं।

विकल्प-1 के तहत राज्यों को वित्त मंत्रालय की तरफ से विशेष व्यवस्था के तहत जीएसटी क्षतिपूर्ति की राशि के बराबर कर्ज आरबीआइ से मिलेगा। इस कर्ज को चुकाने के लिए ये राज्य निर्धारित अवधि से ज्यादा समय तक क्षतिपूर्ति सेस ले सकेंगे। इसमें ब्याज का बोझ राज्यों पर नहीं पड़ेगा। इस विकल्प के तहत जीएसटी की व्यवस्था लागू होने के कारण राज्यों के राजस्व में हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी। इस मद में कुल राशि 97 हजार करोड़ है।

दूसरे विकल्प में राज्यों को बाजार से कर्ज उठाने को कहा गया है। इसके तहत राज्य जीएसटी की व्यवस्था लागू होने के कारण हुए नुकसान के साथ-साथ कोरोना के कारण हुए नुकसान के बराबर कर्ज ले सकेंगे। इस मद में कुल राशि 2.35 लाख करोड़ रुपये है। इसमें केंद्र सरकार 97 हजार करोड़ तक की गारंटी लेगी। इस विकल्प में राज्यों को अपने स्रोत से ब्याज चुकाना होगा।

एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद जो तस्वीर बन रही है, उसके मुताबिक बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली, पंजाब, केरल जैसे गैर-भाजपा शासित राज्य क्षतिपूर्ति को लेकर अपने रुख पर अडिग हैं। इनका कहना है कि पूरे नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करे। केंद्र सरकार का कहना है कि वह बाजार से और ज्यादा उधारी नहीं ले सकती है। राजस्व संग्रह की स्थिति बहुत ही खराब है और केंद्र को पहले ही 2020-21 के लिए अनुमान से छह लाख करोड़ रुपये ज्यादा उधारी लेनी पड़ रही है। और ज्यादा उधारी लेने का सीधा असर देश की रेटिंग पर पड़ेगा। रेटिंग एजेंसियां देश में आर्थिक मंदी को लेकर पहले ही सचेत कर चुकी हैं।

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