ब्रेकिंग
Sir Garfield Sobers: वेस्टइंडीज के महान क्रिकेटर सर गारफील्ड सोबर्स का निधन, सचिन और विराट ने दी श्र... Black Line on Nails: नाखूनों पर दिखने वाली काली लाइन को न करें इग्नोर, हो सकता है स्किन कैंसर का संक... Abhijeet Dipke Ink Attack: जंतर-मंतर पर भारी हंगामा, कॉजपा संस्थापक अभिजीत दीपके पर महिला ने फेंकी स... Heart Attack After Stent: क्या स्टेंट लगने के बाद भी आ सकता है हार्ट अटैक? जानें क्या कहते हैं एक्सप... Nail Polish Buying Tips: नेल पॉलिश खरीदते समय रखें इन बातों का ध्यान, जानें कौन से केमिकल होते हैं ख... Upcoming IPOs: शेयर बाजार में कमाई का शानदार मौका, अगले हफ्ते खुलेंगे 5 नए IPO, चेक करें डिटेल्स Gold Rate Forecast: 6 हफ्ते बाद सस्ता हुआ सोना, जानें अब खरीदारी का सही समय है या नहीं ICICI Bank Q1 Results: आईसीआईसीआई बैंक का शानदार प्रदर्शन, शुद्ध लाभ करीब 14% बढ़कर 15,440 करोड़ रुप... Egg Price Hike: 9 रुपये तक पहुंचा एक अंडे का भाव, मक्का और सोयाबीन के महंगे होने से बढ़ी कीमतें JK Cement Q1 Results: जेके सीमेंट का शुद्ध लाभ 15.3% घटा, लेकिन परिचालन आय में हुआ शानदार इजाफा
देश

कांग्रेस के ढुलमुल रवैये से पार्टी की खिसकती सियासी जमीन पर हावी हो रहे क्षेत्रीय दल

बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के बाद पार्टी के कुछ नेता फिर से इस बात को लेकर मुखर हुए हैं कि देश के इस सबसे पुराने राजनीतिक दल की छवि का लगातार गिरना चिंता का विषय है। बिहार में विपक्षी महागठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस ने दबाव बनाकर 70 सीटें तो ले ली थीं, लेकिन वह केवल 19 सीटें ही जीत पाई। यदि कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती तो शायद स्थिति कुछ दूसरी होती। इन दिनों कांग्रेस में बिहार की पराजय का जिक्र तो हो रहा है, लेकिन उसके कारणों पर गौर करने की कोई ठोस पहल होती नहीं दिख रही। कुछ नेताओं ने अपने इस्तीफे की पेशकश की है, लेकिन लगता नहीं कि कांग्रेस नेतृत्व मूल समस्या पर विचार करने को तैयार होगा। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि कुछ क्षेत्रीय नेताओं को बलि का बकरा बना दिया जाए। इसके आसार इसलिए हैं, क्योंकि कपिल सिब्बल की ओर से उठाए गए सवालों पर ध्यान देने के बजाय पार्टी के कई नेता उनकी निंदा-आलोचना में जुट गए हैं। सिब्बल के बाद जब पी. चिदंबरम ने कांग्रेस की कमजोर हालत पर सवाल खड़े किए तो गांधी परिवार के चाटुकार नेताओं ने उन पर भी हमला बोल दिया। उनकी ओर से यहां तक कह दिया गया कि नाखुश नेता कहीं भी जाने को आजाद हैं।

बिहार की हार पर गांधी परिवार शांत, तेजस्वी ने 247 रैलियां कीं, राहुल ने मात्र आठ जनसभाएं कीं

बिहार की हार पर गांधी परिवार शांत है। पार्टी को पर्दे के पीछे से चला रहे राहुल गांधी सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चुनाव के दौरान जहां तेजस्वी यादव ने 247 रैलियां कीं, वहीं राहुल गांधी ने केवल आठ जनसभाएं कीं। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस चुनाव प्रचार को लेकर गंभीर नहीं थी तो फिर उसने 70 सीटें क्यों मांगीं? कांग्रेस बिहार के नतीजों को लेकर किस तरह गंभीर नहीं, इसका पता इससे भी चलता है कि बीते दिनों सोनिया गांधी की मदद के लिए बनाई गई सलाहकार समिति की एक बैठक अवश्य हुई, लेकिन उसमें बिहार या फिर अन्य राज्यों के उपचुनाव के नतीजों पर चर्चा नहीं हुई। इस बैठक में चर्चा हुई कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के समर्थन में चलाए जा रहे आंदोलन की आगे की रुपरेखा पर।

कांग्रेस की कमजोर होती जमीन, एमपी में चार माह पहले सत्ता में थी, उपचुनावों में मिली करारी हार

कांग्रेस किस तरह पराजय के कारणों पर विचार करने से मुंह चुरा रही है, इसका एक और प्रमाण है गत दिवस आर्थिक, विदेश और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर विचार के लिए तीन समितियों का गठन। ऐसे ही रुख-रवैये से कांग्रेस जमीनी स्तर पर कमजोर हो रही है। उसकी कमजोर होती जमीन का पता इससे भी लगता है कि जिस मध्य प्रदेश में वह चार माह पहले सत्ता में थी, वहां उपचुनावों में भी उसकी करारी हार हुई। मध्य प्रदेश को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस पार्टी का वहां रसूख नहीं था। वहां कुछ वर्ष पूर्व ही कांग्रेस ने भाजपा को मात दी थी। आखिर कमल नाथ अपने विधायकों की ओर से छोड़ी गई सीटें क्यों नहीं जिता सके? क्या इस कारण कि कांग्रेस के जो विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में गए उनका अपना रसूख था, न कि पार्टी का।

सोनिया गांधी का पुत्रमोह कांग्रेस की लुटिया डुबो रहा

कांग्रेस को इसका आभास होना चाहिए कि आजादी की लड़ाई लड़ने और करीब चार दशकों तक शासन करने वाली पार्टी आम आदमी के मन से उतरती जा रही है। कांग्रेस एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल है, लेकिन वह कभी नेहरू-गांधी परिवार के प्रभुत्व से बाहर नहीं निकल सकी। यह किसी से छिपा नहीं कि कैसे जवाहर लाल नेहरू ने पहले इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाया। फिर इंदिरा ने संजय गांधी और राजीव गांधी को। यही काम सोनिया गांधी ने पहले राहुल और फिर प्रियंका को आगे बढ़ाकर किया। वह अपने विदेशी मूल के कारण प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं तो उन्होंने मनमोहन सिंह को इसलिए पीएम बनाया, ताकि वह राहुल के लिए चुनौती न बन सकें। अब तो भारतीयों की इस धारणा पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी अपनी मुहर लगा दी है। सोनिया गांधी अभी भी राहुल को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं। उनका यह पुत्रमोह ही कांग्रेस की लुटिया डुबो रहा है, क्योंकि राहुल अनमने ढंग से राजनीति कर रहे हैं।

राहुल गांधी की अपरिपक्व राजनीति

भले ही राहुल के करीबी यह दावा करें कि वह हर विषय के जानकार हैं और राजनीति को बहुत बारीकी से समझते हैं, लेकिन जनता के बीच उन्हें लेकर इसके उलट धारणा है। संसद में प्रवेश करने के बाद पहले पांच साल तक तो उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछा। इसके अगले पांच साल उन्होंने कई बार मनमोहन सिंह पर परोक्ष रूप से निशाना साधा। बीते छह साल से प्रधानमंत्री मोदी उनके निशाने पर हैं। वह जनसभाओं से लेकर सोशल मीडिया में उनके खिलाफ जो मन में आता है, वह बोलते रहते हैं। कई बार वह जरूरत से ज्यादा बोल जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के प्रति राहुल गांधी का रवैया किसी परिपक्व नेता की तरह न होकर एक ऐसे युवराज जैसा है, जिसका साम्राज्य छीन लिया गया हो। शायद इसी कारण राहुल प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को राष्ट्रीय हित से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक को लेकर भी घेरते हैं और राफेल सौदे को लेकर भी। अनुच्छेद 370 की समाप्ति और फिर गुपकार गठबंधन में कांग्रेस की कथित भागीदारी के मामले में भी उनका रवैया गोल-मोल ही है।

कांग्रेस की राष्ट्रीय छवि को धूमिल करता राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर ढुलमुल रवैया

राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर ढुलमुल रवैया कांग्रेस की रही-सही राष्ट्रीय छवि को धूमिल करता है। इसी कारण कांग्रेस तेजी के साथ सिमटती जा रही है। अब तो वह अपने दम पर राजनीति करने के बजाय क्षेत्रीय दलों पर निर्भर होती जा रही है। उनके साथ गठबंधन में उसकी भूमिका सहायक दल की ही होती है। बेमेल-कमजोर और मजबूरी वाले गठबंधन करने में पार्टी ने जिस तरह विचारधारा को भी हाशिये पर रख दिया है उससे वह और अधिक कमजोर होती जा रही है।

कांग्रेस की जमीन पर काबिज हो रहे क्षेत्रीय दल

इसी कारण सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर राष्ट्रीय राजनीति पर पकड़ रखने और देश की समग्र समस्याओं पर बात करने वाला यह राष्ट्रीय दल अपना वजूद क्यों खोता जा रहा है? कांग्रेस के कमजोर होने का परिणाम यह है कि जो क्षेत्रीय दल अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ उभर रहे हैं वे कांग्रेस की जमीन पर काबिज हो रहे हैं। समझना कठिन है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के लिए अपनी जमीन क्यों छोड़ रही है? यह ठीक है कि भारत एक संघीय ढांचे वाला देश है, पर फिलहाल अधिकांश क्षेत्रीय दल अपनी स्थानीय आकांक्षाओं को इतना अधिक आगे रख रहे हैं कि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर पर्याप्त विचार ही नहीं कर पाते। स्पष्ट है कि कांग्रेस की कीमत पर इन दलों का मजबूत होना भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

Related Articles

Back to top button