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भारतीय लोकतंत्र को बंधक बनाने वाला किसान आंदोलन ने राष्ट्र को शर्मसार कर उस पर एक धब्बा लगा दिया

दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर वही हुआ, जिसकी आशंका थी। कृषि कानूनों के विरुद्ध दो महीने से चल रहे किसान आंदोलन ने हिंसक और राष्ट्रविरोधी स्वरूप लेकर गण, तंत्र और गणतंत्र, तीनों को शर्मसार किया। जिस पंजाब ने तिरंगे की शान के लिए अपने असंख्य सपूतों का बलिदान दिया, उसी पंजाब से किसानों का मुखौटा लगाए धनपतियों के अराजक साथियों द्वारा लाल किले पर तिरंगे का अपमान पंजाब और देश के नाम पर धब्बा लगाने जैसा है। इस प्रकरण में गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के धैर्य की तारीफ करनी होगी, अन्यथा लाल किले में अनर्थ हो सकता था। वास्तव में सामाजिक आंदोलनों पर किसी भी संगठन या नेता का इतना नियंत्रण नहीं होता कि वह उसे अनुशासित रख सके और एक छोटे समूह द्वारा अचानक की गई अराजकता को रोक सके। जैसा अपेक्षित था, संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने हिंसा की तमाम वारदातों और लाल किले की घटना से अपना पल्ला झाड़ लिया। कुछ ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी ली, लेकिन आखिर किसानों को कृषि कानूनों पर गुमराह करने, कानून वापस लेने के लिए उकसाने और गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली निकालने की जिद के बाद अब इसका क्या औचित्य?

किसान नेताओं ने अड़ियल रुख अपना कर भारतीय लोकतंत्र को बंधक बना लिया

कृषि कानूनों के विरोध पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक समिति भी बनाई, जिसे किसानों की बात सुनकर अपनी रिपोर्ट देनी है। सरकार ने भी किसान नेताओं से कई दौर की वार्ता कर किसी हल पर पहुंचने की कोशिश की। सरकार इसके लिए भी तैयार थी कि डेढ़ वर्ष तक इन नए कानूनों को स्थगित रखा जाए, लेकिन किसान नेताओं ने अड़ियल रुख अपना कर भारतीय लोकतंत्र को बंधक सा बना लिया। हम विदेशी ताकतों का मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन अपनों का क्या करें? ऐसा ही असफल प्रयोग नागरिकता कानून पर किया गया था, जो कई माह बाद दिल्ली में भीषण हिंसा के बाद खत्म हुआ। यह ध्यान रहे कि कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने इन दोनों आंदोलनों का नेतृत्व किया। कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने और मोदी विरोध के प्रयास में वे राष्ट्रविरोधी ताकतों के शिकंजे में फंसते जा रहे हों?

अन्ना आंदोलन सुधारात्मक था जबकि किसान आंदोलन प्रतिरोधात्मक है

अपने देश में सामाजिक आंदोलनों की गौरवशाली परंपरा रही है। हाल में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोकपाल आंदोलन चलाया, जिसे अपार जनसमर्थन मिला। अन्ना आंदोलन का स्वरूप सुधारात्मक था। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बनवाना चाहता था, जबकि किसान आंदोलन का स्वरूप प्रतिरोधात्मक है। यह कानूनों को समाप्त कराना चाहता है। इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में भीड़ जुटाना कठिन नहीं, लेकिन उसके द्वारा कानून वापस लेने का दबाव डालना एक गलत नजीर है। कल किसी और कानून को वापस लेने की ऐसी ही मांग उठ सकती है। नए कृषि कानून ढांचागत सुधारों की तरफ साहसी कदम हैं, लेकिन यदि इनसे किसानों को कोई राहत नहीं मिली तो भावी सरकारें इन्हेंं संशोधित या निरस्त कर सकती हैं। आखिर इन कानूनों से इतना डर क्यों? ऐसा ही भ्रम तब पैदा किया गया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण लागू किया। तब शंका थी कि अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी और विदेशी कंपनियां देसी उद्योगों का खात्मा कर देंगी। पिछले 30 वर्षों का अनुभव इसके विपरीत रहा। इस दौरान अर्थव्यवस्था में नौ गुना और बजट में 19 गुना वृद्धि हुई तथा विदेशी मुद्रा भंडार 5.8 अरब डॉलर से सौ गुना बढ़ कर 580 अरब डॉलर हो गया है

यदि किसानों की आय बढ़ाना है तो एमएसपी की गारंटी समाधान नहीं

किसानों के लिए महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन ने प्याज, गन्ना और कपास के दामों को लेकर अनेक आंदोलन किए। शेतकारी संगठन हमेशा किसानों के लिए खुले बाजार की मांग करता रहा है, लेकिन अनेक राज्यों के कानूनों ने किसानों को उत्पाद बेचने के लिए मंडियों और अढ़तियों का बंधक बना दिया है। नए कृषि कानून उन्हेंं बंधनमुक्त करना चाहते हैं, लेकिन जो छोटे किसान इससे लाभान्वित हो सकते हैं, उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं। नए कृषि कानूनों को अगले तीस वर्षों के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। यदि किसानों की आय बढ़ाना है तो एमएसपी की गारंटी उसका समाधान नहीं। उसके लिए किसान को कृषि उत्पादक से कृषि व्यापारी बनाना पड़ेगा। अभी किसान केवल फसल पैदा करने में मशगूल रहता है। नए कृषि कानून ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं कि किसानों का ग्रामीण संगठन बने। वे सामूहिक रूप से एकजुट होकर पंचायत स्तर पर बड़े व्यापारियों से लाभकारी अनुबंध कर सकें और विक्रय एवं लाभकारी मूल्य की चिंता से मुक्त हो खेती कर सकें। इससे किसानों को एमएसपी से भी ज्यादा मूल्य मिल सकेगा। इससे पंचायत स्तर पर भंडारण की सुविधाएं विकसित होंगी, जिससे किसान तब अपना उत्पाद बेच सके, जब उसे उचित मूल्य मिले। इसके लिए ब्लॉक स्तर पर मार्केटिंग अधिकारियों की नियुक्ति की जा सकती है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। दिल्ली में जमा किसान नेता यह सब समझने को तैयार नहीं।

सामाजिक आंदोलनों को राजनीतिक दलों द्वारा हथिया लिए जाते हैं

सामाजिक आंदोलनों से जनता की आस्थाएं इसीलिए खत्म हो रही हैं, क्योंकि वे प्राय: राजनीतिक तत्वों या दलों द्वारा हथिया लिए जाते हैं। अन्ना आंदोलन को अरविंद केजरीवाल ने, कम्युनिस्टों के आंदोलन को सीपीआइ एवं सीपीएम ने हथियाया। स्वतंत्रता आंदोलन को कांग्रेस ने और शेतकारी संगठन को शरद पवार ने। आज स्थिति यह है कि किसान आत्महत्या में महाराष्ट्र सबसे आगे है। अन्ना का लोकपाल लुप्त हो गया है। कम्युनिस्टों की पूर्ण क्रांति का पता नहीं और कांग्रेस पतन की ओर है।

किसान आंदोलन अराजक तत्वों के हत्थे चढ़ गया

किसान आंदोलन अराजक तत्वों के हत्थे चढ़ गया। आंदोलनों के माध्यम से लोकतांत्रिक सरकारों का ध्यान सामाजिक सरोकारों की ओर खींचना जरूरी है, पर इसके लिए आंदोलन का स्वरूप स्वतंत्र और स्वायत्त होना अपरिहार्य है। राजनीतिक दलों द्वारा हाईजैक होने से आंदोलनों की धार कुंद हो जाती है। सामाजिक आंदोलनों का लोकतंत्र में सदैव स्वागत है, लेकिन उन्हेंं भारतीय लोकतंत्र को बंधक बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। किसान आंदोलन ने लोकतंत्र को बंधक ही नहीं बनाया, उसे शर्मसार कर उस पर एक धब्बा भी लगा दिया।

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