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इंदौर में घरों में रहकर मनाई ईद, कोरोना के कारण 52 वर्ष पुरानी परंपरा नहीं निभ पाई

इंदौर। मुस्लिम समाज ने शुक्रवार को ईद मनाई। हर वर्ष ईद की नमाज ईदगाह पर होती है लेकिन कोरोना के चलते इस बार समाजजनों ने घर में ही ईद की नमाज अदा की। हर बार जहां सदर बाजार, छावनी और खजराना के ईदगाह सहित तमाम छोटी-बड़ी मस्जिदों में नमाज अदा करने वालों की भीड़ लगी रहती थी, इस बार यहां सन्नााटा पसरा रहा। लोगों ने घरों में ही रहकर सुबह ईद की नमाज अदा की और घर के आस-पास ही रहने वाले जरूरतमंदों को ईद पर फित्रा दिया। इस बार ईद की रौनक फीकी नजर आई। ना तो घरों पर रोशनी की गई और ना ही नए कपड़ों की चमक खुशियों को बढ़ाने का जरिया बनी। बाजार बंद होने से लोग नए कपड़े, जूते, सजने संवरने का सामान नहीं ले पाए। मस्जिद ही नहीं गली मोहल्ले भी इस बार सूने नजर आए। हर बार जहां ईद की मुबारकबाद देने के लिए लोगों के घर मिलने वालों का तांता लगा रहता था इस बार यह क्रम व्हाट्सएप और फोन काल के जरिए हुआ।

इस बार नहीं दिखी 52 वर्ष पुरानी कौमी एकता की झलक : लाकडाउन के चलते इस बार मीठी ईद पर 52 वर्ष पुरानी कौमी एकता की परंपरा नहीं निभ पाई। हर साल ईद पर शहर काजी डा. इशरत अली को बग्घी में बैठाकर सलवाड़िया परिवार के सदस्य नमाज अदा करने के लिए ले जाया करते थे। ईद पर सत्यनारायण सलवाड़िया शहर काजी को ईद की शुभकामनाएं उनके निवास पर जरूर पहुंचे। सलवाड़िया ने बताया कि उनके पिता स्व. रामचंद्र सलवाड़िया ने कौमी एकता परंपरा की शुरुआत की थी। मीठी ईद पर शहर काजी को उनके निवास स्थान से बग्घी में बैठाकर सदर बाजार ईदगाह तक ले जाते थे, उसके बाद ही नमाज अदा होती थी। उस वक्त शहर काजी डा.याकूब अली थे। इसी परंपरा को अब मैं निभा रहा हूं, लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो पाया।

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