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पहले देश की सरहद में सजग, अब गांव में रोजगार की अलख

कोरबा। माटी का महत्व भला एक फौजी और किसान से अधिक कौन जान सकता है। थल सेना के राष्ट्रीय रायफल में कारगिल व श्रीनगर जैसे चुनौतीपूर्ण स्थानों पर तैनात रहे कोरबा के सेवानिवृत्त सैनिक रामकुमार केंवट का जज्बा भी कुछ ऐसी ही मिसाल पेश कर रहा। वे अपनी छह एकड़ जमीन में पिछले कुछ सालों से वे सब्जी उगा रहे थे। कोरोनाकाल में बेरोजगार हुए लोगों की पीड़ा को समझ उन्होंने आसपास की 24 एकड़ जमीन लीज पर ली और सब्जी के अलावा फल की उन्नात खेती शुरू की। इतना ही नहीं, लाकडाउन में बेरोजगार हुए 45 लोगों को रोजगार से जोड़कर उन्होंने जय जवान जय किसान के नारे को साकार भी किया है।

उन्नात खेती की अलख जगाने वाले बांकीमोंगरा गजरा बस्ती निवासी रामकुमार केंवट को बचपन से ही फौज में जाने की इच्छा थी। 12वीं तक पढ़ाई के बाद वर्ष 2005 में थल सेना के राष्ट्रीय रायफल बटालियन चयनित हुए। महाराष्ट्र नासिक के सैनिक कैंप में प्रशिक्षण के बाद उनकी पहली पोस्टिंग अंबाला में हुई। इसके बाद कारगिल, श्रीनगर, कुपवाड़ा जैसे संवेदनशील जगहों में तैनाती रही। इस बीच उनके पिता का देहांत हो गया और जिम्मेदारी रामकुमार पर आ गई। उनके पिता साउथ ईस्टर्न कोल फिल्ड लिमिटेड (एसइसीएल) में कर्मचारी थे। परिवार का दायित्व निभाने रामकुमार ने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर गांव लौटना उचित समझा। अनुकंपा नियुक्ति के बाद वर्तमान में वे बगदेवा खदान में वरिष्ठ सुरक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हैं। सेना में भर्ती से पहले भी वे घर की खेती में अपना हाथ बंटाते रहे। इस वजह से उन्हें खेती की भी अच्छी जानकारी थी। उन्होंने ढेलवाडीह स्थिति खुद की छह एकड़ जमीन में सब्जी की खेती शुरू की। कार्य को व्यवसायिक रूप देने के लिए 24 एकड़ अतिरिक्त जमीन लीज में लेकर खेती को विस्तार दिया। ग्रीष्म में उन्होंने 2000 क्विंटल तरबूज और बंगला (खरबूज) की फसल तैयार की थी। इस बीच लाकडाउन लगने और बाजार बंद होने से उन्हें काफी नुकसान भी हुआ। पर विषम परिस्थितियों में उन्होंने ना केवल खेती को जारी रखा, बल्कि आस-पास के 45 बेरोजगारों को अपने खेतों में रोजगार भी दिया। तरबूज की खेती से हुए लाभ को उन्होंने काम में लगे समूह में ही बांट दिया।

नुकसान उठाया, नहीं रोका भुगतान

रामकुमार ने बताया कि वे स्वयं एसईसीएल में पदस्थ हैं इसलिए खेती में नुकसान का असर ज्यादा महसूस न हुआ। लाकडाउन में लाभ तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने अपने मजदूरों को भुगतान भी नहीं रोका। वर्तमान में वे खेत में करेला, बरबट्टी, भिंडी की वृहत पैमाने में उपज ले रहे हैं। उनका यह भी कहना है वे खेती को 100 एकड़ तक विस्तार देकर अधिक से अधिक लोगों को रोजगार जोड़ना चाहते हैं।

ड्रिप विधि से खेती को बनाया आधार

रामकुमार ड्रिप विधि से खेती करते हैं। इस विधि में फसल को जितने पानी की आवश्यकता होती है, उतनी मात्रा में दिया जाता है। इससे पानी की बर्बादी नहीं होती। खेत में कीचड़ भी नहीं होता। इससे फसल में रोगों की संभावना कम रहती है। रोग होने पर भी उपचार करना आसान होता है और लागत भी कम आती है। इस तरह की उन्नात विधियों से जुड़कर बेहतर पैदावार से किसानों की आर्थिक दशा सुधर सकती है।

युवाओं का पलायन रोकने की जरूरत

रामकुमार का कहना है युवाओं का गांव से शहर की ओर पलायन एक बड़ी चिंता का विषय है। इनमें ऐसे भी युवा हैं, जिनके घर में खेती-किसानी के लिए पर्याप्त जमीन भी है। उन्होंने युवाओं को गांव में रोकने और खेती को व्यवसायिक रूप देने के लिए शासन-प्रशासन को सामने आने की जरूरत बताई। उनका रूझान बढ़ाने के लिए गांव में उन्नात खेती का प्रदर्शन करना होगा ताकि युवाओं को प्रेरित किया जा सके।

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