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मध्यप्रदेश

मप्र के छह सहकारी दुग्ध संघ दूध की भारी कमी से रुबरु हो रहे

भोपाल । मध्यप्रदेश के भोपाल सहित छह सहकारी दुग्ध संघ दूध की भारी कमी से रुबरु हो रहे हैं। गर्मी के इस मौसम में रोजाना आने वाले दूध की आवक 6.75 लाख लीटर तक आकर सिमट गई है। मांग के अनुरुप दूध की आवक नहीं हो पा रही है। हालात ऐसे है कि कभी-कभी तो 6 लाख लीटर दूध ही मिल पा रहा है, जबकि उपभोक्ताओं के लिए 10 लाख लीटर दूध की रोज मांग आ रही है। इसमें से 7.50 लाख लीटर दूध की मांग तरल रूप में आपूर्ति के लिए और बाकी का 2.50 लाख लीटर दूध सांची दही, लस्सी, मावा, पेड़ा, लड्डू, मठा समेत अन्य उत्पाद बनाने के लिए लग रहा है। कमी को पूरा करने दुग्ध संघों ने हर वर्ष की तरह पाउडर का उपयोग शुरू कर दिया है। ये आवक कम होने के पीछे गर्मी में दूध की पैदावर कम होना मानते हैं जबकि ऐसा नहीं है। प्रदेश में भरपूर दूध है, लेकिन सहकारी दुग्ध संघ किसानों को अधिकतम 700 रुपये प्रति किलोग्राम फैट की दर से भुगतान कर रहे हैं जो कि गाय का दूध प्रति लीटर अधिकतम 30 रुपये और भैस का दूध 40 रुपये पड़ रहा है जबकि निजी कंपनियां इसी दूध का किसानों को प्रति लीटर दो से चार रुपये बढ़ाकर दे रही है। जिसकी वजह से किसान संघों में कम दूध बेच रहे हैं।अकेले भोपाल सहकारी दुग्ध संघ के पास मई के पहले हफ्ते में तरल रूप में सांची दूध की मांग 3.10 लाख लीटर रोज थी लेकिन आवक 2.10 लाख लीटर से लेकर 2.20 लाख लीटर ही हो रही थी। आगे यह आवक और गिरेगी। गर्मी के दिनों में गाय व भैस की दूध देने की क्षमता बारिश व ठंड की तुलना में अपेक्षाकृत कम हो जाती है। यह हर वर्ष होता है इसलिए गर्मी के दिनों में हर वर्ष दुग्ध संघों द्वारा किसानों से खरीदे जाने वाले दूध के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। भोपाल सहकारी दुग्ध संघ ने एक मई से खरीदी दाम 680 रुपये से बढ़ाकर 700 रुपये प्रति किलोग्राम फैट किया है। ये दाम दूसरे संघों ने काफी पहले ही बढ़ा दिए थे। किसान हर बार समय पर खरीदी दाम बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। इस बार भी गर्मी शुरू होने से पहले दाम बढ़ाने की मांग को लेकर अड़ गए थे। सीहोर समेत अन्य जिलों में तो आठ दिन तक सहकारी समितियों में दूध नहीं बेचा था। इतना ही नहीं, किसानों की नाराजगी यह भी रहती है कि बारिश व ठंड में जब उनके पास पर्याप्त दूध होता है तब दाम कम कर दिए जाते हैं। अभी भी जो दाम दे रहेे हैं वह निजी कंपनियों की तुलना में कम है। यही वजह है कि निजी कंपनियां मप्र से बड़ी मात्रा में दूध महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली में बेच देती है। किसानों को सहकारी संघों की तुलना में दाम भी अधिक देती हैं। इस बारे में एमपीसीडीएफ मप्र के पूर्व चेयरमैन सुभाष मांडगे का कहना है कि प्रदेश में दूध का भरपूर उत्‍पादन हो रहा है। कोई कमी नहीं है। जितना दूध हो रहा है उसका 10 से 11 प्रतिशत भी दूध सहकारी संघ नहीं खरीद पा रहे है। ऐसा दुग्ध संघों द्वारा विपणन क्षमता नहीं बढ़ाने के कारण हो रहा है। संघों को नए सिरे से ढ़ांचागत सुधार करने की जरूरत है। सरकार को भी इस पर ध्यान देना होगा।

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