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प्रदेश के दो कैंट बोर्डों में विलय की प्रक्रिया शुरू जबलपुर-पचमढ़ी में हलचल नहीं

जबलपुर। केंटोन्मेंट बोर्ड के सिविल एरिया (रहवासी क्षेत्र) को समीपस्थ निकाय में शामिल किए जाने की प्रक्रिया ने चल रही है। लेकिन जबलपुर कैंट को लेकर अब तक काेई स्पष्ट नीति सामने नहीं आ पाई है। मध्यप्रदेश के पांच केंटोन्मेंट बोर्डों में से मुर्रार और सागर में विलय की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। जबकि जबलपुर, पचमढ़ी और महू कैंट में किसी प्रकार की हलचल नहीं है। इस वक्त देश के 21 केंट बोर्ड में प्रक्रिया एक साथ शुरू कर दी गई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि जल्द ही सभी कैंट बोर्डों की स्थानीय निकायों में विलय प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

सिविल एरिया का स्थानीय निकायों में होना है विलय

मुर्रार और सागर को केंटोन्मेंट को प्रक्रिया में शामिल किए जाने को लेकर राजनीतिक गतिविधियां भी शुरू हो गई है। इस संबंध में पूर्व कैंट बोर्ड मेंबर ने क्षेत्रीय विधायक को पत्र भी लिखकर जबलपुर कैंट को भी प्रक्रिया में शामिल कराने की मांग की है। हालांकि रक्षा मंत्रालय पहले ही यह निर्णय ले चुका है कि देश के सभी 62 केंटोन्मेंट बोर्ड के सिविल एरिया का स्थानीय निकायों में विलय किया जाएगा।

इनको बनाया समिति का सदस्य

रक्षा मंत्रालय ने कैंट बोर्ड के सिविल एरिया एवं कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों का भविष्य तय करने के लिए सात सदस्यीय समिति बनाई है। इसमें संयुक्त सचिव (एल एंड डब्ल्यू) रक्षा मंत्रालय को अध्यक्ष बनाया गया है, जो बतौर सरकार के प्रतिनिधि की भूमिका भी निभाएंगे। इसके अलावा अपर महानिदेशक (छावनी) डीजीडीई, मुख्य सचिव (संबंधित प्रदेश), महानिदेश∞क रक्षा संपदा, संबंधित कमान के निदेशक, अध्यक्ष कैंट बोर्ड, कैंट बोर्ड सीईओ को बतौर सदस्य कमेटी में रखा गया है। यह कमेटी विलय प्रक्रिया में शामिल संबंधित कैंट बोर्ड की वर्तमान संपत्तियों, कर्मचारियों एवं अन्य संसाधनों का आंकलन कर उनके भविष्य को लेकर अपनी अनुशंसा देगी।

बंगले-बगीचे रहेंगे डीईओ के पास

सबसे ज्यादा गहमागहमी बंगले और बगीचा क्षेत्र में रहने वाले लोगों को लेकर है। क्योंकि वे वर्तमान में वे शासकीय अभिलेखों के अनुसार अतिक्रमणकारी हैं। इसीलिए उनके नाम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते केंट बोर्ड की मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए थे। जानकारों का कहना है कि फिलहाल बंगले, बगीचों का प्रबंधन रक्षा संपदा विभाग (डीईओ) के पास रहेगा। इसे लेकर फिलहाल कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।

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