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सावन में आगरा का भक्तिमय माहौल बेहद रोचक है यहां के शिवालय से जुड़ी कहानियां

इस बार सावन का पवित्र महीना 4 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस साल श्रावण मास के मध्य में पुरुषोत्तम मास पड़ने से सावन 60 दिनों तक चलेगा। आगरा के लिए सावन का महीना बेहद ही खास होता है। आगरा में सावन से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जिससे हर शहरवासी जुड़ा है। एक विशेष मान्यता के अनुसार सावन के पहले सोमवार के साथ ही आगरा के चारों कोनों पर स्थित शिवालयों पर विशाल मेले लगना शुरू हो जाते हैं। सावन के पहले सोमवार के राजपुर चुंगी स्थित राजेश्वर महादेव मंदिर पर, दूसरे सोमवार बल्केश्वर स्थित बल्केश्वर महादेव मंदिर पर, तीसरे सोमवार सिकंदरा स्थित कैलाश महादेव मंदिर पर और चौथे सोमवार शाहगंज स्थित पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर पर भव्य मेला लगाया जाता है।

भक्तिमय हो जाता है आगरा

इन मेलों के साथ ही शहर के मध्य में रावली और श्रीमनः कामेश्वर महादेव मंदिर पर भी सावन के हर सोमवार को भक्तों की भीड़ उमड़ती है। राजपुर चुंगी स्थित राजेश्वर मंदिर की विशेषता है कि यहां शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। वहीं बल्केश्वर महादेव मंदिर की भी विशेष मान्यता है। सिकंदरा स्थित कैलाश मंदिर में एक ही जलहरि में दो शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं पृथ्वीनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग को पृथ्वीराज चौहान ने खोजा था, इन्हीं के नाम पर इनका नाम पृथ्वीनाथ महादेव पड़ा। यहां एक ही पत्थर से बने शिवलिंग पर शिवजी का पूरा परिवार विराजमान है।

शिव मंदिर से पहले था श्मशान

वहीं रावतपाड़ा स्थित श्रीमनः कामेश्वर मंदिर की पौराणिक मान्यता है कि यहां पहले श्मशान था। भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए जाते समय भगवान शिव ने यहां रात्रि विश्राम करने के बाद शिवलिंग की स्थापना स्वयं की थी। रावली महादेव मंदिर को लेकर मान्यता है कि रेल पटरी बिछाने के लिए अंग्रेजों ने शिवलिंग को हटाने की काफी कोशिश की थी, लेकिन अगली सुबह पटरियां टेढ़ी पड़ जाती थी। इसके बाद मंदिर को बचाते हुए एस आकार में पटरियों का यहां से गुजारा गया।

पूरी रात परिक्रमा की परंपरा

सावन के दूसरे सोमवार को पूरी रात आगरा की परिक्रमा लगाई जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु नंगे पैर चलकर शहर के चारों कोनों पर स्थित शिवालयों का जलाभिषेक करते हैं। 42 किलोमीटर की इस परिक्रमा के मार्ग में जगह-जगह पर भंडारों का आयोजन किया जाता है। सावन के तीसरे सोमवार शहर के सिकंदरा स्थित प्राचीन कैलाश मंदिर पर मेला लगता है। इस दिन के लिए स्थानीय स्तर पर अवकाश भी घोषित किया जाता है। इसकी शुरुआत अंग्रेज अधिकारी ने अपनी पत्नी के मंदिर में मिलने पर की थी, जो कि जंगल में शिकार करने के दौरान खो गई थीं।

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