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मध्यप्रदेश

इशारों को जरा समझो राज को राज रहने दो

राजनीति भी किसी युद्ध से कम नहीं होती। मध्य प्रदेश इस समय ऐसे ही राजनीतिक युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। भाजपा और कांग्रेस की सेनाएं आमने-सामने हैं। लेकिन कांग्रेसियों को रह-रहकर एक ही दर्द सता रहा है कि भाजपा ने अपने प्रत्याशियों की सूची काफी पहले जारी कर दी और उनके दल में अब तक सूची तो दूर सूची का जिक्र तक कोई नहीं कर रहा। जब भी केंद्रीय और राज्य स्तर के नेताओं का मालवा-निमाड़ क्षेत्र में दौरा होता है तो उन्हें सबसे ज्यादा इसी सवाल का सामना करना पड़ता है कि सूची कब आ रही है। बीते दिनों पूर्व मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेताओं ने घेराबंदी की। टीम कमलनाथ जब सवालों से परेशान हो गई तो जवाब में सिर्फ इतना ही कहा राजनीति में इशारों को भी समझा करो। जिन्हें चुनाव लड़ना है उन्हें इशारा कर दिया गया है बाकी बातें राज ही रहने दो।

हाथ खाली हैं तेरे शहर तक आते-आते टिकट होता तो जरूर लुटा देता

आचार संहिता की उल्टी गिनती शुरू होने के बाद भाजपाई सबसे ज्यादा टिकटों को लेकर परेशान हैं। जो दो सूचियां जारी हुई हैं उसके बाद सबसे ज्यादा चिंता उन्हें हो रही है जिन्होंने टिकट के लिए अपने क्षेत्र से लेकर दिल्ली तक अच्छा-खासा ‘निवेश’ कर दिया है। दूसरी सूची में दस विधानसभा क्षेत्रों में हुए उलटफेर के बाद यह चिंता और बढ़ गई है। अपने-अपने जिन संपर्कों से निश्चिंतता का आश्वासन मिला था अब उनके दर पर दावेदार दोबारा मत्था टेक रहे हैं। चर्चा का लब्बो लुबाब यही रहता है कि देखना ‘दोनों’ मोर्चों पर न पिछड़ जाएं। सबसे ज्यादा परेशानी, धार, इंदौर, उज्जैन, खंडवा की सीटों के दावेदारों को हो रही है। उधर आश्वासन देने वाले नेता भी मन मसोस कर यही कह पाते हैं कि टिकट के मामले में अब तक भी उनके हाथ खाली ही हैं।

चिंगारी को शोला बना रही… ये हवाएं किधर से आ रहीं

दो सूचियां जारी कर विपक्षी दल पर बढ़त की खुशी मना रहे भाजपाइयों को कहीं-कहीं ये जल्दी भारी पड़ती नजर आ रही है। अब इंदौर जिले के देपालपुर विधानसभा सीट का किस्सा ही लीजिए। सामान्य सीट होने की वजह से यहां वैसे भी कई दावेदारों ने मैदान संभाल रखा था लेकिन जैसे ही पार्टी ने मनोज पटेल का टिकट तय किया अचानक हिंदू संगठन का झंडा लिए विरोधी खेमे ने मैदान संभाल लिया। अचानक उभरे इस नए नाम ने भाजपाइयों को चौंकाया भी। अब पटेल की टीम के साथ ही संगठन के पदाधिकारी भी यह जानने में जुटे हैं कि चुनाव के पहले तक जो चिंगारी भी नजर नहीं आ रही थी वो अचानक शोला कैसे बनने लगी है। विरोध की आग को आखिर हवा कहां से मिल रही है। नाराज भाजपा के खेमे से कुछ सुबूत पदाधिकारियों के हाथ लगे भी हैं अब आगे-आगे देखिए होता है क्या।

तीन दशक पुराने इतिहास पर दोनों दलों की नजर

मालवा-निमाड़ को यूं ही सत्ता का केंद्र नहीं कहा जाता। 66 विधानसभा सीटों वाला यह क्षेत्र वाकई राजनीतिक रूप से इतना दमदार है कि जिसने यहां बढ़त बना ली उसकी आगे की राह निष्कंटक हो जाती है। बीते तीन दशकों में यहां हुए आधा दर्जन से अधिक विधानसभा चुनाव में जिसने वोटों के दहाई प्रतिशत का आंकड़ा पार कर लिया वो आसानी से जंग जीत लेता था। लेकिन इस बार कहानी कुछ और है। दोनों ही दलों के सूरमा की नजर तीन दशक पुराने 1993 के चुनाव पर है। तब ऐसी ही खींचतान की स्थिति में दोनों दलों को 32-32 सीटें मिली थी जबकि एक सीट पर निर्दलीय ने जीत हासिल की थी। मैदानी आंकलन में न भाजपा पूरी तरह निश्चिंत है न कांग्रेस। इस बार की मुकाबला बराबरी के आसपास रहा तो दोनों की राह मुश्किल हो जाएगी। इसलिए पूरी ताकत इस क्षेत्र पर दोनों दलों के दिग्गज अंतिम वक्त तक झोंकने की तैयारी में हैं। परिणाम क्या होगा ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।

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