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बिहार में पीके फैक्टर कितना प्रभावी? बढ़ते वोट शेयर से टेंशन में BJP

बिहार की राजनीति में एक बड़ा फैक्टर होकर उभरे प्रशांत किशोर की सभाओं में जबरदस्त भीड़ जुट रही है. सोशल मीडिया पर उनको जमकर अट्रैक्शन मिल रहा है. युवाओं में लोकप्रियता देखने को मिल रही है. अपनी सभाओं में प्रशांत किशोर एनडीए सरकार को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. प्रशांत किशोर पलायन, बेरोजगारी, करप्शन समेत जमीन से जुड़े वो मुद्दे उठा रहे हैं, जो एक विपक्षी पार्टी उठाती है. दिलचस्प बात ये है कि जिस बिहार की राजनीति में जाति हावी रहती है वहां प्रशांत किशोर ऐसे वर्ग के वोटरों को लुभाते नजर आ रहे जो परंपरागत तौर पर बिहार में एनडीए का कोर वोटर माना जाता रहा है.

कई ओपिनियन पोल भी ये बता रहे हैं कि प्रशांत किशोर बीजेपी के वोटबैंक में सेंध लगा सकते हैं. कुछ ओपिनियन पोल बता रहे हैं कि प्रशांत किशोर 8 से 10 फीसदी वोट ले सकते हैं तो कुछ उनको किंगमेंकर तक बता रहे हैं. बिहार का ये पीके फैक्टर सत्ताधारी एनडीए में चिंता और चर्चा की वजह बना हुआ है. सार्वजनिक तौर पर बीजेपी नेता भले ही पीके फैक्टर को बेअसर बताए पर बिहार को लेकर बीजेपी की हर बैठकों में चर्चा का एक मुद्दा पीके फैक्टर होता ही है.

बीजेपी की परेशानी ये है कि प्रशांत किशोर बिहार बीजेपी के प्रमुख नेताओं और मंत्रियों को ही निशाने पर रखे हुए हैं. पीके ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल के मेडिकल कॉलेज का मुद्दा उठाया, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय को इस मेडिकल कॉलेज में लपेटा, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की शैक्षणिक डिग्री पर सवाल पूछा, पूर्व बीजेपी अध्यक्ष संजय जायसवाल से पेट्रोल पंप के मालिकाना हक को लेकर सवाल उठाए.

बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ ही प्रशांत किशोर मुद्दे भी आम जनता और जमीन से जुड़े और सरकार के खिलाफ वाले ही उठा रहे हैं, जिसमें बेरोजगारी, बिहार से लोगों का पलायन, करप्शन जैसे मुद्दे युवाओं को कनेक्ट भी कर रहे हैं. पिछड़े समाज से जुड़ी बैठकों और सभाओं में पीके सवाल उठाते है कि आखिर क्यों बिहार के पिछडी समाज के युवओं को नौकरी और पेशे के लिए बिहार से बाहर दिल्ली, गुजरात या बंबई जाना पड़ता है. इसके अलावा पीके का खुद सवर्ण होना भी सवर्ण वोटरों को पसंद आ रहा है जो बिहार के राजनीतिक दलों के पिछड़ा प्रेम को देखते आ रहे है.

पीके फैक्टर कितना प्रभावी?

बीजेपी नेताओं को लगता है पीके इन जमीनी मुद्दों के जरिए आम जनता के बीच एनडीए सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे हैं. भले उनको इसका वोटों में उतना फायदा मिले या ना मिले पर बीजेपी को नुकसान कर सकते हैं क्योंकि सवर्ण वोटर, युवा वर्ग पीके से प्रभावित नजर आता है. इसलिए बिहार को लेकर बीजेपी की हर बैठकों में अमित शाह हो या जेपी नड्डा… प्रदेश बीजेपी नेताओं से ये सवाल जरूर पूछा जाता है कि पीके फैक्टर कितना प्रभावी है. फॉरवर्ड वोटर बीजेपी से ना छिटके उसके लिए क्या कदम उठाया जा रहा है. युवाओं के जोड़ने के लिए क्या कार्यक्रम कर रहे हैं.

बढ़ते वोट शेयर से टेंशन में BJP

बीजेपी नेताओं का मानना है कि प्रशांत किशोर सिर्फ आरोप की राजनीति कर रहे है, जिसमें तथ्य नहीं हैं. बीजेपी नेताओं के खिलाफ करप्शन के आरोपों के जवाब में बीजेपी पीके की फंडिंग को लेकर सवाल पूछ रही है कि आखिर घाटे में चलने वाली कंपनियां कैसे और क्यों पीके के कैंपेन को करोड़ों में चंदा दे रही है. बीजेपी का आकलन है कि प्रशांत किशोर भले अभी 5-6 फीसदी वोट के करीब हों पर चुनाव करीब आते आते ये घटकर 2 से ढाई फीसदी रह जाएगा. वजह ये कि पीके ने अभी हर विधानसभा में 10-10 लोगों को टिकट देने का वादा किया है पर टिकट एक को मिलेगा ऐसे में 9 नाराज होंगे.

साथ ही बीजेपी नेताओं का तर्क है कि पिछले चुनाव में चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को मिलाकर जो करीब 10-11 फीसदी वोट एनडीए से दूर चला गया था वो इस बार उनके साथ है. साथ ही पीके के बारे में भले बीजेपी की आंतरिक बैठकों में चर्चा हो पर सार्वजनिक तौर पर बीजेपी नेता पीके की चर्चा करके इनको प्लेयर नहीं बनाना चाहते.

बीजेपी नेता ये भी कह रहे है बिहार के सवर्ण और युवा वोटर पीके को वोट देकर बीजेपी को हराने और लालू-तेजस्वी के जंगलराज की वापसी कभी नहीं चाहेंगे. ऐसे में युवा वोटरों को बीजेपी से जोड़ने, जंगलराज के बारे में बताने और पीके को काउंटर करने के लिए बीजेपी हर विधानसभा में 10,000 मोदी मित्र बनाने का अभियान भी शुरू करने जा रही है. ये मोदी मित्र डिजीटल सैनिक की तरह काम करेंगें जो सोशल मीडिया पर बिहार के युवाओं खासकर फर्स्ट टाईम वोटरों को लालूराज के जंगलराज की याद दिलाएंगे. साथ ही मोदी मित्रों की ज़िम्मेदारी डिजिटल तरीके चुनाव प्रचार की होगी जिसमें सरकार के कामकाज को सोशल मीडिया के माध्यम से युवा वोटरों तक पहुंचाया जाएगा.

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