क्लीन एनर्जी भरपूर, फिर भी कोयले पर निर्भरता क्यों?: ग्रिड क्षमता और बैटरी स्टोरेज की कमी से बर्बाद हो रही सौर ऊर्जा

नई दिल्ली: भीषण गर्मी के दौरान जब भारत में बिजली की कुल मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही थी और रात के वक्त एसी चलने के कारण पावर सप्लाई संकट गहरा रहा था, उस समय रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को अपना उत्पादन कम करने के निर्देश दिए जा रहे थे।
इस विरोधाभास का मुख्य कारण यह रहा कि देश के पास वर्तमान ग्रिड क्षमता से कहीं अधिक क्लीन एनर्जी उपलब्ध थी, जिसे मौजूदा ट्रांसमिशन नेटवर्क सुरक्षित रूप से संभालने में सक्षम नहीं था। वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक एम्बर (Ember) के एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 15 महीनों में भारत ने लगभग 11 टेरावाट-घंटे (TWh) सौर ऊर्जा का इस्तेमाल ही नहीं किया। यह इतनी बड़ी मात्रा है जिससे करीब एक करोड़ घरों को साल भर रोशन किया जा सकता था।
⚡ क्लीन पावर के सामने ‘कर्टेलमेंट’ की बड़ी चुनौती: कोयला संयंत्रों को धीमा करना मुश्किल
उत्पादन और ग्रिड संतुलन की तकनीकी रुकावटें:
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300 गीगावाट की क्षमता: भारत के पास वर्तमान में 300 गीगावाट से अधिक स्वच्छ ऊर्जा (Clean Power) क्षमता मौजूद है, जो देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता के आधे से ज्यादा है।
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कर्टेलमेंट (कटौती) का संकट: इसके बावजूद देश की अधिकांश बिजली का उत्पादन आज भी कोयला आधारित संयंत्रों से हो रहा है। इसका प्रमुख कारण ‘कर्टेलमेंट’ है—यानी जब सोलर या विंड प्लांट बिजली उत्पादन में सक्षम हों, लेकिन ग्रिड द्वारा भार न ले पाने के कारण उत्पादन जबरन रोकना पड़े।
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थर्मल पावर का लचीला न होना: एम्बर के विश्लेषक नेश्विन रॉड्रिक्स के अनुसार, दोपहर के समय जब सौर ऊर्जा चरम पर होती है, तब कोयला आधारित थर्मल इकाइयों के उत्पादन को अचानक कम करना तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल कार्य है।
📉 कंपनियों को आर्थिक घाटा और बढ़ता कार्बन उत्सर्जन: ट्रांसमिशन लाइनों का अभाव
वित्तीय नुकसान और क्षेत्रीय उत्पादन का दबाव:
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कंपनियों पर सीधा असर: वाइब्रेंट एनर्जी के सीईओ विनय पब्बा के मुताबिक, उत्पादन रोकने (कर्टेलमेंट) से उत्पादक कंपनियों को भारी राजस्व नुकसान झेलना पड़ता है, क्योंकि उन्हें भुगतान केवल उसी बिजली का मिलता है जो ग्रिड तक पहुंच पाती है।
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पश्चिमी राज्यों में अधिक उत्पादन: गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य अकेले देश की लगभग 50 फीसदी सौर ऊर्जा पैदा करते हैं। दोपहर के समय जब यहां सौर ऊर्जा पीक पर होती है, तो उसे अन्य क्षेत्रों तक ले जाने के लिए ट्रांसमिशन लाइनें अपर्याप्त साबित होती हैं।
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कोयले पर निर्भरता: ट्रांसमिशन और स्टोरेज की तत्काल व्यवस्था न होने के कारण सस्ती रिन्यूएबल पावर की उपलब्धता के बावजूद कोयला संयंत्रों को लगातार चालू रखना मजबूरी बन जाता है।
🔋 बैटरी स्टोरेज ही स्थायी समाधान: 2032 तक 74 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य
भविष्य का रोडमैप और स्टोरेज की अनिवार्यता:
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कोयले से सस्ती बैटरी पावर: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के अध्ययन के अनुसार, बैटरी स्टोरेज युक्त रिन्यूएबल पावर नए कोयला संयंत्रों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक किफायती साबित हो सकती है।
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दोपहर की धूप, रात में रोशनी: बैटरी स्टोरेज की सहायता से दोपहर में बनने वाली अतिरिक्त सौर ऊर्जा को संग्रहित कर रात के पीक आवर्स में उपयोग में लाया जा सकता है।
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लक्ष्य से पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत में वर्तमान में लगभग 3 गीगावाट बैटरी स्टोरेज क्षमता है, जबकि वर्ष 2032 तक इसे 74 गीगावाट तक बढ़ाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां नई ट्रांसमिशन लाइनें तैयार करने में कम से कम 3 वर्ष का समय लगता है, वहीं बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) को तेजी से स्थापित कर इस बिजली बर्बादी को रोका जा सकता है।





