Jharkhand Political History: अंग्रेजों के जमाने से है पलामू की दलित राजनीति की नींव, बीजेपी-झामुमो और कांग्रेस की पैनी नजर

पलामू प्रमंडल पूरे झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) की राजनीति का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र माना जाता है। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की नजर हमेशा से यहां के मजबूत एससी वोट बैंक पर रही है। हाल ही में पलामू के पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाए जाने के बाद, पलामू प्रमंडल एक बार फिर पूरे राज्य में दलित राजनीति को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इससे पहले जून 2026 में झामुमो द्वारा पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को राज्यसभा सांसद बनाए जाने से भी राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले हैं।
📊 पलामू में है सबसे बड़ा एससी वोट बैंक, 9 में से 2 विधानसभा सीटें हैं आरक्षित
आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो पूरे झारखंड में पलामू प्रमंडल में ही सबसे अधिक अनुसूचित जाति की आबादी निवास करती है। पलामू जिले में एससी आबादी 27.65%, गढ़वा में 12% और लातेहार में 21.31 प्रतिशत है, जबकि लातेहार में 43% अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी है। झारखंड की कुल 14 लोकसभा सीटों में से इकलौती पलामू लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। वहीं, पलामू प्रमंडल की 9 विधानसभा सीटों में से लातेहार और छतरपुर सीटें भी एससी वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जिससे आगामी परिसीमन को लेकर भी राजनीतिक दलों में सुगबुगाहट तेज हो गई है।
⏳ 1936 से शुरू हुई थी पलामू की सियासत, अंग्रेजों के जमाने से जुड़ा है इतिहास
पलामू में अनुसूचित जाति की राजनीति की नींव अंग्रेजों के शासनकाल में 1936 में जीतू राम ने रखी थी। इसके बाद 1952 और 1957 के चुनावों में रामदेनी राम, रामकृष्ण राम और देवचंद राम पासी जैसे दिग्गजों ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। वर्ष 1967 में पलामू लोकसभा सीट के आरक्षित होने के बाद यहां एक मजबूत राजनीतिक संस्कृति की औपचारिक शुरुआत हुई, जहां कमला कुमारी लगातार चार बार सांसद रहीं। वर्तमान में भाजपा सांसद विष्णुदयाल राम और राज्य एससी आयोग के अध्यक्ष शिवधारी राम के साथ-साथ विभिन्न दलों के चेहरे इस क्षेत्र में अपनी सियासी पकड़ बनाए हुए हैं।