संकुचित राजनीति: भारत-चीन तनाव राष्ट्रीय संप्रभुता को चुनौती है, इस पर राष्ट्र को एकजुटता दिखानी होगी

सत्य निजी नहीं होता। राष्ट्र सामूहिक सत्य और सर्वोपरि निष्ठा है। राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता राष्ट्रजीवन के आधारभूत ध्येय हैं। संप्रभुता से जुड़ी चुनौतियों पर राष्ट्र की एकजुटता अनिवार्य होती है। संप्रति भारत-चीन तनाव राष्ट्रीय संप्रभुता को चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी चुनौती पर विचार-विमर्श के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई। उन्होंने संसदीय जनतंत्र का आदर्श अपनाया। प्रधानमंत्री ने वस्तुस्थिति का विवरण रखते हुए कहा कि सीमाएं सुरक्षित हैं। जल, थल और आकाश में हमारी सेना मुस्तैद है।
हम चीन सीमा पर पहले से बेहतर निगरानी कर रहे हैं, सरकार ने सेना को यथोचित छूट भी दे दी
सरकार ने सेना को यथोचित छूट भी दे रखी है। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्र में तैयार आधारभूत ढांचे को मददगार बताया और स्पष्ट किया कि हम चीन सीमा पर पहले से बेहतर निगरानी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का वक्तव्य राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय संकट के समय भी जिम्मेदारीपूर्ण बातें नहीं कीं। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे़ संवेदनशील प्रश्न पूछे। उन्होंने बैठक के महत्वपूर्ण अवसर का राजनीतिक इस्तेमाल किया। राहुल गांधी ने और आगे जाकर प्रधानमंत्री पर घुटने टेकने का छिछला आरोप लगाया। वामदलों ने भी निराश किया। स्वाभाविक है देश को कांग्रेस और वामदलों का आचरण अच्छा नहीं लगा।
कांग्रेस मोदी को घेरना चाहती है, लेकिन 1962 में जनसंघ के नेता अटल ने केंद्र का समर्थन किया था
कांग्रेस चीन से तनाव को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को घेरना चाहती है। 1962 में देश के सबसे बड़े कांग्रेसी नेता पं. नेहरू प्रधानमंत्री थे। आज की भाजपा तब जनसंघ थी। जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत चीन युद्ध में केंद्र का समर्थन किया था। 1962 के चीन युद्ध में भारत को आहत होना पड़ा था, लेकिन कांग्रेस परिवार की नई पीढ़ी को इतिहास के त्रासद पृष्ठ याद दिलाने का कोई मतलब नहीं है।
सीताराम येचुरी ने चीन की आलोचना करने के बजाय पंचशील सिद्धांत याद किया
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने चीन की आलोचना करने के बजाय पंचशील सिद्धांत याद किया। पंचशील नेहरू के समय 1954 में गढ़ा गया भारत-चीन समझौता था। एक-दूसरे की सीमा और संप्रभुता का सम्मान, परस्पर अनाक्रमकता, अहस्तक्षेप, समानता एवं परस्पर लाभ तथा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पंचशील कहे गए थे। 1957 में इसे संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता दी, लेकिन कम्युनिस्ट विचार में संभवत: शील नहीं होता।
चीन ने 1954 के पंचशील की हत्या 1962 के युद्ध से कर दी
चीन ने 1954 के पंचशील की हत्या 1962 के युद्ध से कर दी। पंचशील चीन का रणनीतिक हथियार था। येचुरी उसी पंचशील की वकालत कर रहे हैं। चीन ने पंचशील की आड़ में भारत की पीठ पर छुरा भोंका। कम्युनिस्टों का बड़ा वर्ग स्वयं को चीन के निकट मानता था। चीन के प्रति सहानुभूति रखने वाला धड़ा माकपा हो गया। येचुरी उसी दल के नेता हैं। पंचशील बहाना है, कहीं और निशाना है, किसी दूसरे को रिझाना है।
दुनिया में सर्वाधिक श्रमिक शोषण करने वाला देश चीन है
भाकपा के डी राजा ने भी सर्वदलीय बैठक का दुरुपयोग किया। राजा के अनुसार, अमेरिका भारत को अपने पाले में खींच रहा है। हमें इसका विरोध करना चाहिए। राजा का विषयांतर दयनीय है। बैठक चीनी तनाव को लेकर थी। वह अमेरिकी गठजोड़ को लेकर बेचैन थे। वह शायद चीन को कम्युनिस्ट और अमेरिका को शोषक पूंजीवादी मान रहे हैं। दुनिया में सर्वाधिक श्रमिक शोषण करने वाला देश चीन है। चीन साम्राज्यवादी पहले से ही है।
ममता बनर्जी ने सर्वदलीय बैठक में कहा- हम सभी प्रयासों में सरकार के साथ खड़े हैं
कांग्रेस एवं वामदलों को छोड़कर अन्य सभी दलों ने अपने संकटकालीन कर्तव्य का पालन किया। केंद्र के प्रति आक्रामक रुख के लिए चर्चित ममता बनर्जी ने सर्वदलीय बैठक में कहा कि हम सभी प्रयासों में सरकार के साथ खड़े हैं।
पवार ने कहा- सीमा पर सैनिकों द्वारा हथियार लेकर जाना या नहीं के मसले समझौते से तय होते हैं
शरद पवार ने गलवन घाटी को चीन से खाली कराने के सुझाव के साथ निहत्थे सैनिकों वाले राहुल गांधी के बयान पर यह कहकर अप्रत्यक्ष टिप्पणी की कि सीमा पर सैनिकों द्वारा हथियार लेकर जाने या बिना हथियार के ही जाने के मसले अंतरराष्ट्रीय करार से तय होते हैं। दलों को ऐसे मसलों पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शिव सेना के उद्धव ठाकरे और बीजद के पिनाकी मिश्रा, सपा के रामगोपाल यादव ने भी केंद्र के साथ एकजुटता व्यक्त की। बसपा प्रमुख मायावती की व्यावहारिक टिप्पणी कहीं उल्लेखनीय रही। उन्होंने कहा कि यह राजनीति का समय नहीं है। वाकई ऐसे अवसरों पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।
राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति का उपकरण नहीं होता
राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति का उपकरण ही नहीं होते। प्राय: हरेक दल का एक विचार होता है। एक संगठन होता है। एक विशाल समूह में उसका प्रभाव क्षेत्र होता है। वह अपने प्रभाव क्षेत्र में लोकमत को प्रभावित करता है। वह प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास करता रहता है। उसे ऐसा करना भी चाहिए।
दल जनादेश पाकर ही सत्ता पक्ष या विपक्ष बनते हैं
दल जनादेश पाकर ही सत्ता पक्ष या विपक्ष बनते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न संवेदनशील होते हैं। संवेदनशील प्रश्नों पर आक्रामक बयानबाजी की तुलना में मौन की शक्ति ज्यादा कारगर होती है। राष्ट्रीय संकट की घड़ी में विपक्ष की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
ब्रिटेन के एक प्रधानमंत्री मैकमिलन ने कहा था- विपक्ष के नेता की स्थिति कठिन होती है
ब्रिटेन के एक प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन ने ठीक ही कहा था, ‘विपक्ष के नेता की स्थिति कठिन होती है। दोष निकालना और आलोचना करना उसका काम है, लेकिन राष्ट्र के प्रति उसकी विशेष जिम्मेदारी भी है।’ कांग्रेस प्रमळ्ख विपक्षी दल है। वह लंबे समय तक केंद्रीय सत्ता में रही है। अभी भी कई राज्यों में सत्तासीन है। प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उसे संकट के समय आदर्श भूमिका निभानी चाहिए।
राहुल के बयान चीन को लाभ पहुंचाने वाले हैं
विपक्ष के अन्य दलों को प्रेरित भी करना चाहिए, लेकिन वह ऐसा नहीं करती। संकट के अवसर पर भी राहुल ने बचकानी टिप्पणियां कीं। उन्होंने सीमा पर बिना हथियार ही सैनिकों की तैनाती के सवाल उठाए। शायद उन्हें अंतरराष्ट्रीय संधियों का सामान्य ज्ञान भी नहीं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उन्हें 1996 और 2005 के समझौते याद दिलाए। राहुल के बयान चीन को लाभ पहुंचाने वाले हैं। मौका है कि वह अन्य विपक्षी नेताओं से कुछ सीखें।
संप्रभुता के प्रश्नों पर सस्ती राजनीति उचित नहीं
संप्रभुता के प्रश्नों पर सस्ती राजनीति उचित नहीं। संकट में अंतरराष्ट्रीय राजनय की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। ऐसे समय बोले गए हरेक वाक्य का गंभीर महत्व होता है। विदेश नीति या सामरिक महत्व के विषय चुनावी बयानबाजी जैसे वक्तव्यों से नहीं हल हो सकते। ऐसे तनाव के समय लोकमत का संवेग भी बढ़ता है। इसलिए वाक संयम की महत्ता बढ़ जाती है। यह शुभ लक्षण है कि अनावश्यक वाचाल कांग्रेस अकेली है।
इतिहास का नियम है कि वह कर्तव्यपालक को पुरस्कृत करता है
वामदल कालबाह्य हैं। शेष दल तंत्र तनाव के विषय पर प्रधानमंत्री के फैसलों के साथ है। यह अवसर राष्ट्रीय एकता प्रदर्शित करने का है। इतिहास प्रत्येक दल के आचरण का संज्ञान ले रहा है। इतिहास का नियम है कि वह कर्तव्यपालक को पुरस्कृत करता है। नियति, प्रकृति और परिस्थिति भारत के साथ है। यह 1962 का भारत नहीं है। यह मोदी के नेतृत्व वाला 2020 का ऊर्जावान भारत है।





