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मध्यप्रदेश

तमिलनाडु के कोकोपिट की तर्ज पर मप्र में बनाई खाद

भोपाल । तमिलनाडु में नारियल अपशिष्ट से तैयार होने वाली कोकोपिट खाद की तर्ज पर प्रदेश के ग्वालियर में इससे बेहतर खाद तैयार की जा रही है। यह बिल्कुल तैयार स्थिति में चौकोर पीस के आकार में होगी जिसे बिना कुछ मिलाए सीधे उपयोग में लिया जा सकेगा। जिला पंचायत ग्वालियर ने यह प्रयोग करके दिखाया है जिसकी कीमत व पोषक तत्व सबसे अहम हैं। तमिलनाडू में नारियल के भाग से यह तैयार की जाती थी जिसमें गुणवत्ता भी कम है लेकिन यहां कृषि अपशिष्ट में नाइट्रोजन,फासफोरस और पोटेशियम की एकाग्रता के साथ पोषण बढ़ाया गया है। वहीं कीमत भी आधी से रखी गई है जिससे इसका फायदा किसानों के साथ साथ शहरी क्षेत्रों को भी मिल सकेगा। किसानों के लिए यह पीस फार्म में नहीं दी जाएगी। इसका सैंपल वरिष्ठ अधिकारियों ने पास भी कर दिया है जो अब इसी माह बाजारों में उपलब्ध होगी। यह महज 25 से 30 रुपए में उपलब्ध होगीतमिलनाडु में नारियल से बचे कचरे से चौकोर आकार के खाद पीस तैयार किए जाते हैं, यह रेडिमेड खाद सीधे गमले में डाले जा सकते हैं। इसके साथ ही पाउडर फार्म में किसानों को मिलता है। यह एक पीस 120 रुपये तक में बिकता है। इसी तर्ज पर ग्वालियर जिला पंचायत के प्रोजेक्ट अफसर जय सिंह नरवरिया ने ग्रामीण इलाकों में कृषि अपशिष्ट से कोकोपिट की तरह चौकोर पीस खाद के तैयार किए हैं, जिनमें पोषक तत्वों का विशेष ध्यान रखा गया है। अप्रैल माह में इसे विधिवत लांच कर दिया जाएगा और सप्लाई की जाएगी। संभाग के आयुक्त आशीष सक्सेना ने भी जिला पंचायत के इस नवाचार की सराहना की। इसे फिलहाल स्व सहायता समूह की मदद से तैयार कराया जा रहा है।

इसलिए बेहतर यह नई खाद
इस खाद में बेसिक एनपीके यानि नाइट्रोजन,फासफोरस और पोटेशियम की एकाग्रता का विशेष ध्यान रखा गया है जिस कारण यह सामान्य खाद व तमिलनाडु की कोकोपिट से कई गुना ज्यादा पोषक है। इससे उद्याानिकी के साथ किसानों को फसलों में भी लाभ मिलेगा। तमिलनाडु की कोकोपिट की बेसिक कीमत 125 रूपए प्रति पीस है जबकि ग्वालियर में बेहतर पोषण के साथ इसकी कीमत 25 से 30 रूपए रखी गई है। इसे कोई भी खरीद सकेगा। जिला पंचायत के प्रोजेक्ट अफसर जय सिंह पहले भी 11 हजार रुपये की कीमत से बायोडायजेस्टर टायलेट तैयार कर चुके हैं और इसे केंद्र स्तर पर सराहा गया था। इसके गांवों में खुले में शौच से लोगों को रोकने के लिए लगाया गया था जिसमें पंचायतों ने भी सहयोग किया।

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