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धार्मिक

व्यापारी के बेटे

एक व्यापारी के दो पुत्र थे। मरने से पहले उसने अपनी संपत्ति दोनों बेटों में बराबर-बराबर बांट दी। एक पुत्र ने अपने व्यापार को काफी बढ़ाया। वह अत्यंत संपन्न होकर समाज के प्रतिष्ठत लोगों में गिना जाने लगा। जबकि दूसरे को व्यापार में घाटा हो गया और उसके परिवार को दो जून की रोटी जुटाने में भी अत्यंत तकलीफें उठानी पड़ीं। अपने भाई की तरक्की और अपनी दुर्दशा देखकर दूसरा भाई एक संत के आश्रम में पहुंचा और बोला, ‘महाराज, मुझे लगता है कि ईश्वर केवल कल्पना है और यदि उसका अस्तित्व कहीं है भी तो वह पक्षपाती है। क्या वह भी पक्षपात करता है? मैं और मेरे भाई दोनों एक ही पिता की संतान हैं। पिता ने दोनों को बराबर हिस्सा दिया। लेकिन वह लगातार तरक्की कर रहा है और मैं रसातल की ओर जा रहा हूं। भला ऐसा क्यों?’
उसकी बात सुनकर संत उसे अपने साथ एक बगीचे में ले गए और बोले, ‘देखो, वहां एक कोने में गन्ना बोया हुआ है, दूसरे कोने में चिरायता है, एक ओर चमेली के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं तो दूसरी ओर गुलाब के पौधों पर फूलों के साथ कांटे भी नजर आ रहे हैं । इनकी इस भिन्नता के लिए इन्हें पैदा करने वाली जमीन दोषी या पक्षपाती नहीं है। जैसा बीज बोया गया है वैसा ही फल मिला है। सुख-दुख और उन्नति-अवनति के लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं बल्कि स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है। उसके कर्म और संस्कार जिम्मेदार हैं। तुम्हारे भाई ने मेहनत और योग्यता से अपने काम को संभाला तो उसकी उन्नति होती गई, इसके विपरीत तुमने आलस्य और भोग-विलास में अपना समय व्यतीत किया तो तुम्हारा धन धीरे-धीरे खत्म होता गया। तुमने मेहनत की ही कब थी जो ईश्वर को दोष दे रहे हो। जैसा कर्म तुमने किया है वैसा ही फल पाया है।’ ह सुनकर दूसरे पुत्र की आंखें खुल गईं। वह अपनी गलती सुधारने का निश्चय कर वहां से चला आया।

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