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लोकसभा चुनाव में करारी हार झेल चुकी कांग्रेस की हरियाणा और महाराष्ट्र में परीक्षा

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में करारी हार झेल चुकी कांग्रेस एक बार फिर जनता के बीच है। जन मानस की अपेक्षा और भरोसों को कांग्रेस किस हद तक अपने पक्ष में कर पाने में सफल हुई, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इसकी फिर से परीक्षा है। दोनों राज्यों में भाजपा बीते पांच साल से सत्ता में है। दोबारा सत्ता में पहुंचने को एक बार फिर राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रखा है। कश्मीर से 370 को निष्प्रभावी करने को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है। जबकि मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस केंद्र की मोदी और राज्य की भाजपा सरकारों के खिलाफ बने सत्ता विरोधी लहर से उम्मीद लगाए हुए है। हरियाणा और महाराष्ट्र कांग्रेस के लिए इसलिए भी ज्यादा अहमियत रखते हैं कि यहां हिंदुत्व से ज्यादा किसानों के मुद्दे असरकारी हैं, बशर्ते की विरोधी दल किसानों का भरोसा जीत ले। महाराष्ट्र में किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं।

हरियाणा के किसान भी सरकार की नीतियों को लेकर बहुत खुश नहीं हैं। दोनों राज्यों में किसान संगठन काफी मजबूत हैं। महाराष्ट्र के किसान तो बीते पांच साल में देवेंद्र फडणवीस सरकार के खिलाफ कई बार रैली-जुलूस कर चुके हैं। इसकी अपेक्षा हरियाणा के किसान शांत रहे। हरियाणा के किसानों ने राज्य की खट्टर सराकर के खिलाफ बीते पांच साल में कोई बड़ा आंदोलन-प्रदर्शन नहीं किया और न ही केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ कोई मोर्चाबंदी की। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि यहां के किसान राज्य और केंद्र सरकार की रीति-नीति से संतुष्ट हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसानों के मुद्दों पर ज्यादा जोर दिया था। मगर, भाजपा के राष्ट्रवाद और बालाकोट एयरस्ट्राइक के आगे बाकी सारे मुद्दे हवा हो गए। न न्याय चला, न रोजगार। नोटबंदी और जीएसटी को लेकर भी कांग्रेस लोगों का भरोसा नहीं हासिल कर पाई। हरियाणा की निवर्तमान विधानसभा में कांग्रेस के 15 सदस्य थे लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

वहीं महाराष्ट्र विधानसभा में 42 सदस्य थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में केवल एक सीट जीत पाई। इस वक्त जो हालात हैं, वह लोकसभा चुनाव से थोड़े अलग हैं। देश आर्थिक मंदी की चपेट में है। तमाम रिपोर्ट इस बात की तश्दीक कर रही हैं कि लोगों के रोजगार लगातार छिन रहे हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है। उत्पाद और निर्यात घट रहा है। रोजमर्रा की जरूरत वाली वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। औद्योगिकीकरण, निवेश ठहर सा गया है। कृषि क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित है। विशेषज्ञ सरकार के जीडीपी दर सात प्रतिशत से ऊपर रहने के प्रस्तावित अनुमान को नकार चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस इन मुद्दों पर क्या जनता को अपनी बात समझा पायी? क्या वह यह विश्वास दिला पायी कि लोकसभा चुनाव में लोगों से हालात का आंकलन करने में कहीं न कहीं चूक हुई?

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