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Ayodhya Verdict: पर्दे के पीछे के किरदारों में UP सबसे आगे, नहीं थे दावेदार तब भी हजारों दस्तावेजों का कराया अनुवाद

नई दिल्ली। अयोध्या में राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक मुकदमें मे 40 दिन चली मैराथन सुनवाई में वैसे तो बहुत से पक्षकार, दावेदार थे। लेकिन कुछ पक्ष ऐसे भी थे जिनकी मुकदमें में दावेदारी तो नहीं थी परन्तु सुनवाई मे भागीदारी पूरी थी। ऐसे ही पर्दे के पीछे के किरदारों में उत्तर प्रदेश सरकार सबसे आगे रही। प्रदेश सरकार के वकीलों की टीम शुरू से अंत तक सुनवाई में दिन रात जुटी रही जबकि उसकी ओर से मुकदमें में न तो कोई बहस हुई और न ही दावा। अयोध्या के मुकदमें की सुनवाई के लिए तय होती तारीखें और फिर सुनवाई का अगली तारीख तक टलना और किसी ने महसूस किया हो न किया हो लेकिन प्रदेश सरकार के वकील कमलेन्द्र मिश्रा और राजीव दुबे ने जरूर महसूस किया जिन्होंने निजी घरेलू परेशानियों को मुकदमे के आगे नजरअंदाज किया था।

तीन महीने में कराया 12500 दस्तावेजों का अनुवाद

वैसे तो इस मामले में प्रदेश सरकार की ओर से मुकदमें की मेरिट पर कभी कोई बहस नहीं हुई लेकिन सुनवाई की तैयारी में उसकी महती भूमिका रही। हाईकोर्ट के दस्तावेजों और गवाहियों के अंग्रेजी अनुवाद की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की थी। प्रदेश सरकार ने तीन महीने में 12500 दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया और पक्षकारों को दिया। रोजाना 12 बैग्स मे भर कर 150 फाइलें जाती थीं कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वकीलों की टीम की अगुवाई सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने की थी।

इस टीम में एडीशनल एडवोकेट जनरल मदन मोहन पांडेय, एडीशनल एडवोकेट जनरल ऐश्वर्या भाटी, कमलेन्द्र मिश्रा और राजीव दुबे के अलावा जूनियर वकीलों में अश्विन शामिल थे। पांडेय जी, कमलेन्द्र, राजीव और अश्विन पूरे 40 दिन रोज सुनवाई में सुबह से शाम तक शामिल रहते थे। कभी कभी तुषार मेहता और ऐश्वर्या भाटी भी आती थीं हालांकि उन्हें कई बार बीच में अन्य मुकदमों की सुनवाई मे अन्य अदालतों में जाना पड़ता था। प्रदेश सरकार के वकीलों की टीम रोजाना 12 बैग्स मे भर कर करीब 150 फाइलें लेकर कोर्ट पहुंचती थी। सुनवाई से आधे घंटे पहले पहुंचकर फाइलों को सलीके से रखा जाता था और शाम को सुनवाई पूरी होने पर फिर से उन्हें बैग्स मे भर कर वापस ले जाया जाता था।

इस मामले मे कई बार सुनवाई टालने की मुस्लिम पक्ष की मांग का प्रदेश सरकार की ओर से तुषार मेहता ने विरोध किया और कोर्ट को लंबे समय से मामला लटके होने की याद दिलाई थी। फैसले के दिन भी तुषार मेहता ने इस मुकदमे की धैर्यपूर्वक सुनवाई और फैसले के लिए कोर्ट का आभार प्रकट किया था। रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने भी ओबलाइज्ड माईलार्ड कह कर कोर्ट का आभार जताया था।

कमलेन्द्र को दुख कि माता जी फैसला नहीं देख पाईंउत्तर प्रदेश सरकार के पैनल वकील कमेलेन्द्र मिश्रा इस मामले में बहुत शिद्दत से जुड़े थे। वह कहते हैं कि माता जी हमेशा केस के बारे में पूछती रहती थीं। हर बार एक ही सवाल होता था भैय्या रामजी का केस कब सुना जाएगा। इसी वर्ष 25 फरवरी को कमलेन्द्र की माता जी को दिल का गंभीर दौरा पड़ा।

उन्हें आनन फानन में नोएडा के नामी गिरामी अस्पताल में भर्ती कराया गया। दूसरे दिन 26 फरवरी को अयोध्या मामले की सुप्रीम कोर्ट मे सुनवाई की तारीख लगी थी। कमलेन्द्र कहते हैं कि 26 तारीख की सुबह माता जी को होश आया वह आईसीयू में थीं उन्होंने देखते ही कहा भैय्या आज तो रामजी का केस लगा है। तुम कोर्ट जाओ वो केस बहुत जरूरी है, यहां और लोग हैं। कमलेन्द्र कहते हैं कि माता जी के कहने पर वह सुनवाई के लिए कोर्ट गए। उस दिन मध्यस्थता के लिए मामला भेजने की बात हुई और सुनवाई टल गई थी। वह लौट कर करीब 12.30 बजे फिर अस्पताल पहुंचे।

माता जी ने देखते ही पूछा क्या हुआ केस में। क्या सुना जाएगा रामजी का केस। कमलेन्द्र ने उन्हें बताया कि मामला मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा और अब कोर्ट ने तय कर लिया है कि अगर मध्यस्थता मे बात नहीं बनती तो कोर्ट मेरिट पर सुनवाई करेगा। उस हार्ट अटैक के बाद उनकी माता जी पूरी तरह ठीक नहीं हो पायीं और सात दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। कमलेन्द्र को इस बात का बहुत दुख है कि माता जी रामजी के केस का फैसला नहीं देख पाईं। अगर वह होती तो जो फैसला आया है उससे बहुत खुश होतीं। तारीखों के साथ टलता रहा आपरेशन और गुम होती रही पत्नी की आवाजप्रदेश के वकील राजीव दुबे टीम के सक्रिय सदस्य और दस्तावेजों की व्यवस्था में शामिल होने के कारण काफी व्यस्त रहे।

बहन की शादी खिसकती रही

सुनवाई की तारीखों में फंस कर न सिर्फ उनकी बहन की शादी जनवरी से अप्रैल तक खिसकती रही बल्कि पत्नी के गले का आपरेशन भी टलता रहा। राजीव की पत्नी के गले में वोकल कार्ड में गांठ हो गई थी जिसके कारण उनकी आवाज कम हो गई थी और दिन पर दिन हो रही देरी से आवाज बहुत कम होती चली गई अंत मे करीब एक महीने तक उनकी पत्नी सिर्फ फुसफुसा कर बोल पाती थी, वह फोन पर बात नहीं कर सकती थीं। राजीव ने गर्मी की छुट्टी में पत्नी के गले का आपरेशन कराया। राजीव कहते हैं कि बहन की शादी और पत्नी का आपरेशन जनवरी से लेकर मार्च तक लगातार सुनवाई की तारीखों की अनिश्चितता के चलते टला था।

तारीख पर तारीख में होती रही देर सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामला 2010 से लंबित था। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल अपीलों को विचारार्थ स्वीकार करते हुए मामले में यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था। उसके बाद यह मामला ढंडे बस्ते मे चला गया। 2015 – 2016 में इक्का दुक्का बार कभी रामलला की ओर से तो कभी किसी अन्य हिन्दू पक्षकार की ओर से मामले पर जल्द सुनवाई की मांग की गई लेकिन केस पर सुनवाई का नंबर नहीं आया।

आम चुनाव के बाद हो सुनवाई

मामले की सुनवाई ने 2017 मे जोर पकड़ा और अगस्त 2017 में महसूस होने लगा था कि जल्दी ही सुनवाई हो जाएगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया केस को तारीख पर तारीख मिलती रही। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर नियमित सुनवाई के लिए 5 दिसंबर 2017 की तारीख तय की लेकिन 5 दिसंबर को भी सुनवाई नहीं हो पायी मुस्लिम पक्षकारों ने सुनवाई का जोरदार विरोध किया और कहा कि मामले पर सुनवाई की ऐसी जल्दी क्या है। मामला अभी सुनवाई के लिए तैयार नहीं है। मुस्लिम पक्षकारों ने कोर्ट से मामले की सुनवाई आम चुनाव के बाद करने की अपील की। करीब दो घंटे तक शोरशराबा और बहस चलने के बाद कोर्ट ने आठ फरवरी की तारीख लगा दी।

इसके बाद अयोध्या भूमि अधिग्रहण को सही ठहराने वाले इस्माइल फारुकी केस के एक अंश पर पुनर्विचार की मुस्लिम पक्षकारों की मांग ने नया पेच फंसाया और कोर्ट ने कई तारीखों तक उस पर सुनवाई की अंत मे 27 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुकी फैसले में नमाज के लिए मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न हिस्सा न मानने वाले अंश को बड़ी पीठ को सुनवाई के लिए भेजने की मांग ठुकरा दी। इसके बाद मामले की सुनवाई कर रहे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा सेवानिवृत हो गई और नये मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 29 अक्टूबर 2018 को मामले को नियमित सुनवाई के लिए जनवरी के पहले सप्ताह में लगाने का आदेश दिया।

फैसला आ गया

आठ जनवरी 2019 को मुख्य न्यायाधीश ने अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ का गठन किया और 9 जनवरी को मामला सुनवाई पर लगा जिसमें मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने सुनवाई पीठ में जस्टिस यूयू ललित के शामिल होने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जस्टिस ललित पहले इस मामले में कल्याण सिंह की ओर से वकील के तौर पर पेश हो चुके हैं। धवन के मुद्दा उठाने पर जस्टिस ललित ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया। इसके बाद 25 जनवरी 2019 को मामले पर सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की नयी संविधान पीठ गठित हुई। यह वही पीठ थी जिसने गत 9 नवंबर को इस मुकदमें मे सर्वसम्मति से फैसला सुनाया है। नयी पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल थे।

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