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मध्यप्रदेश

सरसों का दाम घटने से चंबल में घटा फसल का रकबा, भिंड-मुरैना में पिछले साल की तुलना में कम में खेती

मुरैना। चंबल सरसों की खेती के लिए पूरे देश में ख्यात है। यहां के सरसों तेल की मांग विदेश तक है। इसीलिए, बीते दो दशक से चंबल के मुरैना, भिंड और श्योपुर जिलों में सरसों की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा था, लेकिन बीते दो बरस से सरसों के भाव में बढ़ोतरी की जगह गिरावट होने से किसानों का मन इसकी खेती से उचट गया है। चंबल के तीनों जिलों में सरसों का रकबा पिछले साल की तुलना में इस साल 55717 हेक्टेयर घट गया है।

किसानों में इसकी खेती के प्रति कम हुए रुझान को इस तरह समझें

चंबल का भिंड जिला पूरे मप्र में सरसों उत्पादन में अव्वल है। यहां पिछले साल सरसों की खेती दो लाख 30 हजार 235 हेक्टेयर में हुई, जो इसके पिछले साल से 8205 हेक्टेयर अधिक था। इस बार एक लाख 80 हजार 200 हेक्टेयर में खेती हुई है, यानी रकबा 50035 हेक्टेयर घट गया है। इसी तरह पिछले साल मुरैना में 1000 हेक्टेयर में सरसों की खेती का दायरा बढ़ा, जिसकी तुलना में इस साल 1282 हेक्टेयर में खेती कम हुई है।

श्योपुर में पिछले साल की तुलना में 4400 हेक्टेयर में सरसों की फसल नजर नहीं आ रही है। बता दें कि अंचल के सवा तीन लाख से ज्यादा किसान परिवारों की मुख्य आय का स्रोत सरसों की खेती ही है। खेतों में सरसों की फसल कम होने के साथ मुरैना में तेल मिल भी बंद होती जा रही हैं। जिले में 40 बड़ी तेल मिलें हैं, जिनमें से 34 पर ताला लगा है, पांच-छह बड़ी मिल ही चालू हालत में हैं, जो ब्रांडेड कंपनियों को तेल सप्लाई करते हैं।

चंबल में ऐसे लुढ़का सरसों की खेती का ग्राफ

भिंड में पिछले साल दो लाख 30 हजार 235 हेक्टेयर में सरसों की खेती हुई। इस बार एक लाख 80 हजार 200 हेक्टेयर के करीब रकबा रह गया। यानी 50035 हेक्टेयर कम में खेती।

मुरैना में पिछले साल एक लाख 77 हजार 100 हेक्टेयर में सरसों की खेती हुई। इस बार एक लाख 75 हजार 818 हेक्टेयर में बोवनी हुई। यानी 1282 हेक्टेयर रकबा कम हो गया।

श्योपुर में पिछले साल 73 हजार 400 हेक्टेयर में खेती हुई थी। इस साल रकबा 69000 हेक्टेयर पर सिमट गया। यानी 4400 हेक्टेयर कम में खेती।

विदेशी तेलों की आवक से इस तरह प्रभावित हैं किसान

साल 2020-21 में केंद्र सरकार ने विदेश से आ रहे तेलों पर आयात कर दोगुना से ज्यादा कर दिया था और मिश्रित तेल (ब्लेंडेड आयल) के लाइसेंस रद कर दिए थे। इससे बाजार में सरसों तेल की मांग ऐसी बढ़ी कि इसका भाव 200 रुपये किलो पार कर गया। किसानों को एक क्विंटल सरसों का दाम 8000 से 8100 रुपये तक मिला।

दो साल पहले सरकार ने विदेशी तेल पर बढ़ाए टैक्स को कम कर दिया। इससे विदेश से पाम, राइसब्रान, पाम, कनोला, सोया और अन्य आयल की बंपर आवक होने लगी। विदेशी तेल बाजार में 75 से 80 रुपये किलो के भाव मिलते हैं। इससे सरसों तेल की मांग घटी और सरसों के दाम भी लुढ़कर 6000 से नीचे आ गया। वर्तमान में सरसों का भाव 5300 रुपये प्रति क्विंटल है। इस प्रकार दो साल में सरसों के भाव 2700 रुपये क्विंटल तक कम हो गए। उधर, खाद, बीज, सिंचाई महंगी हो गई।

यह बात सही है कि सरसों का रकबा कई साल से लगातार बढ़ रहा था, लेकिन इस बार लक्ष्य और पिछले साल से भी कम बोवनी हुई है। इसके पीछे का कारण सरसों का दाम कम होना ही है।

पीसी पटेल, संचालक, कृषि विभाग मुरैना।

सरकार ने विदेशी तेलों पर टैक्स बढ़ाया तो सरसों तेल की मांग बढ़ी, किसान व तेल व्यापारियों को फायदा भी हुआ, लेकिन जैसे ही विदेशी तेलों की बंपर आवक शुरू हुई, सरसों तेल का कारोबार ठप हो गया। मुरैना की अधिकतर मिलें बंद हैं।

मनोज जैन, तेल मिल संचालक, मुरैना।

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