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उत्तरप्रदेश

दो कौड़ी की चाय… टेस्ट गजब पर नाम है बदनाम; क्यों खास है इस शहर की चायलॉजी?

उत्तर प्रदेश के कानपुर को एक समय बड़ी बड़ी मिलों की वजह से ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता था. साथ ही इसे मजदूरों का शहर भी कहा जाता था, क्योंकि यहां की मिलों में लाखों मजदूर काम किया करते थे. ऐसे में कोई एक चीज जो मालिक और मजदूर को जोड़ती थी तो वो थी चाय. आधुनिक दौर में कानपुर में अब चाय अपने नए टेस्ट और नाम में मौजूद है. कानपुर में चाय की दुकानों के ऐसे अजीबोगरीब नाम हैं, जो ग्राहकों को अपनी ओर खींच लेते हैं.

जब भी हम कहीं चाय पीते हैं और कोई हमसे पूछता है कि चाय कैसी थी तो ऐसे में चाय अगर अच्छी नहीं होती है तो हम कहते है यार, दो कौड़ी की चाय थी. लेकिन कानपुर में इसी को दुकान का नाम रखकर चाय बेची जा रही है और ग्राहकों की यहां भीड़ लगती है. स्वरूप नगर में मौजूद इस दुकान में जवानों से लेकर बुजुर्ग सब चाय की चुस्कियां लेते देखे जा सकते हैं. इसके ओनर प्रभात पांडे बताते हैं कि उन्होंने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़कर चाय का बिजनेस शुरू किया. जब दोस्तों को बताया तो उन्होंने कहा तुम्हारी बनाई चाय “दो कौड़ी की होती है”. बस यहीं से नाम रख लिया दो कौड़ी की चाय. आज इसके चार आउटलेट हैं.

बदनाम चाय

अगर आप कानपुर में रहते हैं तो आपने बदनाम कुल्फी का नाम जरूर सुना होगा. लेकिन यहां पर मौजूद है, बदनाम चाय. यह दुकान कानपुर की मशहूर कोचिंग मंडी काकादेव में है और यहां स्टूडेंट्स की भीड़ लगी रहती है. सुबह हो या रात यहां की चाय इतनी “बदनाम” है कि ग्राहकों की भीड़ हर समय मौजूद रहती है. दुकान के मालिक अजय कुशवाहा बताते हैं कि उनके भाई एक चाय की दुकान पर बैठते थे. वहां से आइडिया आया और दुकान का नाम बदनाम चाय रख लिया.

चायलॉजी

हम सब ने अपने स्कूल के दिनों में सोशियोलॉजी सुना है, साइकोलॉजी सुना है, लेकिन कानपुर में तो साहब चायलॉजी भी मौजूद है. शहर के व्यस्त इलाके हर्ष नगर में ‘चायलॉजी बॉय चाय वालाज’ की दुकान है. एक बार नाम पढ़ने पर लगता है कि शायद किसी किताब की दुकान होगी, लेकिन ऐसा नहीं है. यहां पर ग्राहक चाय की चुस्कियों लेने आते हैं. चूंकि चाय पर चर्चा होना तो आम बात है इसलिए इसका नाम भी चायलॉजी रखा गया.

चाय का चलन आज से नहीं, बल्कि सैकड़ों साल से है. जानकारी के अनुसार चाय की खोज 2737 बीसी में हुई थी और 19वीं शताब्दी में अंग्रेज भारत में चाय लेकर आए थे. तब से आज तक चाय इस देश के लोगों की लाइफलाइन बन चुकी है. अब चटकारे नामों की वजह से चाय का स्वाद और भी बढ़ता जा रहा है.

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