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मध्यप्रदेश

MIG-21 का ग्वालियर एयरबेस से पुराना नाता, 2004 में हवा-जमीन पर यूएस वायुसेना को दिखा चुका कौशल

ग्वालियर। भारतीय वायुसेना का जंगी लड़ाकू विमान मिग-21 ग्वालियर एयरबेस के आसमान से लेकर जमीन तक जांबाजी का साक्षी रहा है। देश के सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस में शामिल ग्वालियर एयरफोर्स स्टेशन पर मिग-21 बाइसन वर्ष 2004 में भारतीय वायुसेना और यूएस एयरफोर्स के संयुक्त कोप इंडिया अभ्यास में शामिल रहा। 62 वर्ष के गौरवशाली इतिहास के साथ आज भारतीय वायुसेना से विदाई लेने वाले इस लड़ाकू विमान का ग्वालियर से गहरा नाता रहा है।

ग्वालियर में 2022 के बाद से मिग-21 की गूंज सुनाई नहीं दी। ग्वालियर एयरबेस के जांबाज अधिकारियों ने मिग-21 में उड़ान भरकर देश को गौरवान्वित किया है। ग्वालियर एयरबेस पर मिग-21 ने लंबे समय तक उड़ान भरी साथ ही युद्धों से लेकर विभिन्न वायुसेना के आयोजनों में भी सहभागिता की है। एयरबेस पर तैनात रहे अफसरों ने मिग-21 के जरिए कौशल भी दिखाया है। बता दें कि यह विमान 1963 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था।

आखिरी बार मिग-21 ने प्रयागराज में कुंभ मेले में एयरशो में भाग लिया था। मिग-21 की अधिकतम गति लगभग 2,200 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह 17,500 मीटर की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। हवा से हवा में मार करने वाली और हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलें लगाई जाती थीं। विमान का डिजाइन छोटा पर शक्तिशाली था, जो तेज हमलों व हवाई युद्ध के लिए आदर्श माना गया।

2004 में ग्वालियर में हुआ था कोप इंडिया अभ्यास

ग्वालियर में कोप इंडिया अभ्यास के दौरान मिग-21 बाइसन ने अपनी युद्ध क्षमता का बखूबी प्रदर्शन किया। इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को संयुक्त राज्य वायुसेना के एफ-15 जैसे विमानों के खिलाफ खड़ा किया गया था। घने विद्युत चुंबकीय माहौल में अच्छे प्रदर्शन के कारण इसे अमेरिकी फोर्स की भी सराहना मिली। इस पूरे अभ्यास में बाइसन अपनी धैर्यता व क्षमता के कारण नेतृत्व की भूमिका में रहा।

देश में अहम है ग्वालियर एयरबेस

ग्वालियर का महाराजपुरा एयरफोर्स स्टेशन 1942 में बना था और अब तक हुए युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है। वर्ष 1965, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसी एयरफोर्स स्टेशन से लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी थी। ये स्टेशन देश का एकमात्र एयरबेस है, जहां फाइटर प्लेन में हवा में ईंधन भरा जा सकता है। अगर युद्ध के दौरान उड़ान के वक्त किसी फाइटर प्लेन को ईंधन की जरूरत पड़ी तो इस एयरबेस पर तुरंत दूसरा जेट प्लेन हवा में जाकर ही उसे रिफ्यूल कर सकता है।

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