सिर्फ चावल खाया है,दूध नहीं उतर रहा है, 8 दिन की बेटी को क्या पिलाऊं

नई दिल्ली: देशभर में लॉकडाउन तीन मई तक बढ़ाया गया है। इसके साथ ही देश के विभिन्न भागों में फंसे लाखों प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। लोगों को मुश्किल से एक वक्त का खाना नसीब हो पा रहा है। लोगों का कहना है कि कोरोना का तो पता नहीं लेकिन भूख से जरूर मर जाएंगे। एक ऐसा ही मामला राजधानी दिल्ली का है।
लॉकडाउन के दौरान महक नाम की एक महिला ने बेटी को जन्म दिया है। न तो अस्पताल जाने के पैसे थे और न साधन, 22 साल की महक और उनके पति गोपाल उत्तराखंड के नैनीताल के एक गांव के रहने वाले हैं। पुरानी दिल्ली के टाउनहॉल इलाक़े की एक बिल्डिंग में मज़दूरी करते हैं। लेकिन अब लॉकडाउन के चलते सब बंद हैं। महक बताती हैं दो दिन में बस एक बार ही खाना नसीब होता है, बेटी को देख पिता गोपाल के आंसू नहीं रुकते, महक ने कहा,’बस एक मुट्ठी चावल खाया है..दूध नहीं उतर रहा है..बेटी को कैसे पिलाऊं ‘
ये कहानी सिर्फ़ महक की ही नहीं है पास में खड़ी बिहार के नवादा की रहने वाली चांद रानी का भी यही हाल है। घर में बस थोड़ा सा चावल है जिससे उन्हें अपने चार छोटे बच्चों को खिलाना है। चूल्हा ठंडा पड़ा है क्योंकि पकाने को अनाज ही नहीं है। वो करनाल, हरियाणा, के भठ्ठे में अपनी पति मदन के साथ मज़दूरी करती थीं। पैदल चल कर किसी तरह दिल्ली पहुंची और तब से यही इनका आशियाना है। चांद रानी ने बताया, ये चावल है यही खिलाएंगे और सूखी पूड़ियां हैं कुछ नहीं मिलता तो बच्चों को पानी के साथ ये पूड़िया खिला देते हैं।






