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छत्तीसगढ़

कोसा कांसा और कंचन की नगरी बना जांजगीर चांपा, जानिए कैसे

जांजगीर चांपा: जिले को कोसा, कांसा और कंचन के नाम से मिली पहचान अब रंग लाने लगी है. जांजगीर चांपा से बड़े पैमाने पर कोसा के साथ खादी और सूती कपड़ों का निर्माण कर निर्यात किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ और देश के दूसरे राज्यों में यहां के बने कपड़ों की डिमांड भी बढ़ती जा रही है. कोसा धागे से कपड़ा बनाने वाली महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रही हैं. कोसा से कपड़ा बुनने वाली महिलाएं कहती हैं कि उनके बच्चे अब अच्छी तालीम हासिल कर रहे हैं. आमदनी बढ़ने से उनके जीवन स्तर में भी सुधार आया है. कई महिलाओं ने घरों में कपड़ा बुनने की मशीन तक लगा रखी है.

कोसा कांसा और कंचन की नगरी बना जिला: बुनकर का काम करने वाली महिलाएं कहती हैं कि वो अपने काम से संतुष्ट हैं. उनके हाथों से बने जैकेट, साड़ी और दुपट्टे की बाजार में बढ़िया डिमांड है. बुनकरों के बनाए कपड़ों की बढ़ती डिमांड और उनकी आमदनी को देख कई महिलाएं इस लघु उद्योग से जुड़ रही हैं. कई महिलाएं इस काम का प्रशिक्षण भी रहे हैं ताकि वो अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें.

देशभर में कोसा से बने कपड़ों की बढ़ी डिमांड: निर्माण कार्य से जुड़ी महिलाएं बताती हैं कि पहले वो दूसरों के घरों में जाकर काम करती थी लेकिन प्रशिक्षण रके बाद उन लोगों ने अपना काम शुरू किया. काम शुरू करने के साथ साथ अब दूसरों को भी ट्रेंड कर रही हैं. बुनकरी के काम से जुड़ी महिला समूह की सदस्य कहती हैं कि अपने काम की बदौलत उनको अब देशभर में पहचान मिल रही है. बड़े बड़े महानगरों जैसें कोलकाता, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में उनको अपनी प्रोडक्ट बेचने और वहां पर दुकान लगाने का मौका मिल रहा है. लोग उनके काम की सराहना करते हैं तो उनको कुछ और बेहतर करने का अवसर भी मिलता है.

राज्योत्सव में लगा स्टॉल: जांजगीर चाम्पा जिले में आयोजित राज्योत्सव में सिवनी और आसपास के गांव की महिलाओ ने अपने हाथों से बनाए कोसा की साड़ी, जैकेट जैसे कपड़े की स्टॉल लगाई है. बड़ी संख्या में लोग इन स्टॉलों से पकड़ों की खरीदी कर रहे हैं. इस काम से जुड़ी महिला समूह की सदस्यों का कहना है कि कपड़ों के व्यापारियों की भी डिमांड उनके पास आ रही है. डिमांड के हिसाब से कपड़े तैयार कर व्यापारियों को भी दे रहे हैं.

घर बैठे पैसा कमाने का यह बेहतर साधन है. पहले हम रोजी मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे. जब से इस काम को शुरू किया है तब से घर में बरकत होने लगी है. अब दो पैसा बचता है भी और बच्चे भी अच्छी पढ़ाई पढ़ रहे हैं. परिवार की गाड़ी अब पटरी पर दौड़ रही है: सरस्वती बरेठ, सदस्य महिला समूह

पहले हम दूसरों के यहां जाकर काम करते थे लेकिन अब हमने अपना काम शुरू किया है. हम साड़ी,जैकेट दुपट्टा जैसी चीजें बनाते हैं. कई शहरों में जाकर हमें दुकान लगाने का भी मौका मिलता है. अब हम अपने काम से पैसा भी कमा रहे हैं: अहिल्या बाई कश्यप,अध्यक्ष, महिला समूह

देवांगन और दूसरे समाज के लोगों ने शुरू किया काम: कोसा के काम में अब देवांगन समाज ही नहीं बल्कि दूसरे समाज की महिलाओं ने इस काम को अपना लिया है. समूह से जुड़ी महिलाएं कहती हैं कि इन लोगों ने मिलकर 350 से अधिक महिलाओं को समूह से जोड़ा है. सभी महिलाएं अपने घर मे ही समय निकाल कर साड़ी का निर्माण करती हैं. 8 से 10 हजार महीना कमा लेती हैं. महिला समूह द्वारा निर्मित कोसा की साड़ी, जैकेट की बाजार में अच्छी डिमांड है, पैसे भी इसके 3 हजार से लेकर 8 हजार तक मिल जाते हैं.

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