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बिहार

एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला! सोनपुर मेले का वो इतिहास, जब भगवान विष्णु ने चलाया था सुदर्शन चक्र, इस बार 1000 घोड़ों ने बढ़ाई शान

बिहार के सारण में दुनियाभर में मशहूर हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले की शुरुआत हो गई है, जो एक महीने यानी 10 दिसंबर 2025 तक चलेगा. यह मेला गंगा और गंडक नदियों के संगम हरिहर क्षेत्र में आयोजित होता है. यही संगम स्थल धार्मिक रूप से बहुत पवित्र माना जाता है. यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था, जहां हाथी, घोड़े, और दूसरे पशु बेचे-खरीदे जाते हैं.

इस साल 9 नवंबर से इस मेले की शुरू हो गई है. इस दौरान कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ. इस मेले में दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं और मेले का आनंद लेते हैं. मेले के दौरान ट्रैफिक व्यवस्था का भी खास ख्याल रखा जाएगा. इसके लिए तैयारियां कर ली गई हैं. इसी बीच उद्घाटन समारोह में कमिश्नर भी पहुंचे. उन्होंने इस दौरान कहा कि यह भूमि भगवान हरि, विष्णु और हर, शिव दोनों की है. बिहार का प्रसिद्ध हरिहरनाथ मंदिर देश का इकलौता ऐसा स्थल है, जहां गर्भगृह में भगवान विष्णु और भगवान शिव की एक साथ पूजा होती है. यहां सृष्टि के पालन और संहार दोनों की प्रतीकात्मक एकता दिखाई देती है.

रोज कलाकार करेंगे अपनी कला का प्रदर्शन

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला सदियों से श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक बना हुआ है. समय के साथ मेले का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी आत्मा अब भी लोक संस्कृति और जनजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है. स्थानीय लोग इसे छत्तर मेला के नाम से भी जानते हैं. इस साल ये मेला एक महीने चलेगा. इस दौरान हर रोज कई कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे. इस मेले में सुई से लेकर हाथी तक लगभग सभी कुछ बिकता है.

इस साल भी अलग-अलग राज्यों से व्यापारी मेले में पहुंच रहे हैं. इनमें सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र हर बार घोड़ा बाजार बनता है. इस बार भी एक से बढ़कर एक घोड़े मेले में पहुंचेंगे. अब तक हजारों घोड़े मेले में पहुंच भी चुके हैं. अलग-अलग विभागों के कई स्टॉल मेले में लगाए गए हैं. मेले में मनोरंजन के लिए थिएटर की भी व्यवस्था की जाती है. इस बार भी 7 थिएटर अब तक आ चुके हैं.

अलग-अलग तरह की वस्तुओं की दुकानें सजीं

पशु बाजार में भी धीरे-धीरे पशुओं की आमद शुरू हो गई है. कश्मीरी ऊनी कपड़ों, खिलौनों और अन्य वस्तुओं की दुकानें सज गई हैं. वहीं प्रशासन की ओर से विभागों के प्रदर्शनी स्टॉल भी लगाए जा रहे हैं. विदेशी पर्यटकों के लिए टेंट हाउस तैयार किए जा रहे हैं, जबकि भारतीय पूर्व-मध्य रेलवे की ओर से रेलग्राम में खास प्रदर्शनी का आयोजन होगा. मनोरंजन के लिए मेले में झूले, सर्कस और मौत का कुआं जैसी पारंपरिक प्रस्तुतियां भी पहुंच चुकी हैं. हर दिन राज्य के अलग-अलग हिस्सों से हजारों-लाखों लोग मेला घूमने आते हैं. दिनभर खरीदारी और घूमने-फिरने के बाद पर्यटक रात में थिएटरों का आनंद लेते हैं, जिससे पूरा मेला रंगीन और जीवंत माहौल से भर जाता है.

क्या है गज और ग्राह की प्रचलित लोककथा?

मेले को लेकर पुरानी कहानी काफी प्रचलित है. यहां गज यानी हाथी और ग्राह यानी मगरमच्छ की कहानी काफी मशहूर है. कहा जाता है कि भगवान विष्णु के दो पहरेदार थे. दोनों ही उनके बहुत बड़े भक्त थे. इनमें से एक का नाम जय और दूसरे का नाम विजय था. ये दोनों ब्रह्मा के मानस पुत्रों के श्राप की वजह से धरती पर पैदा हुए और एक गज यानी हाथी बन गया और दूसरा ग्राह यानी मगरमच्छ बन गया.

एक दिन गंगा और गंडक नदियों के संगम पर स्थित कोनहारा घाट पर हाथी यानी गज पानी पीने आया. वह पानी पी रहा था कि मगरमच्छ यानी ग्राह ने उसका मुंह जकड़ लिया. ऐसे में दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गया. ये युद्ध सालों तक चलता रहा. फिर भी काफी मशक्कत करने के बाद भी मगरमच्छ ने गज का मुंह नहीं छोड़ा. फिर हाथी कमजोर करने पड़ने लगा और उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की.

जब भगवान विष्णु ने छोड़ा था सुदर्शन चक्र

इसके बाद गज की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र छोड़ा और मगरमच्छ की मौत हो गई. फिर हाथी भी मगरमच्छ के मुंह से निकल गया. इसी लीला को देखने के लिए कोनहारा घाट पर सभी देवी-देवता प्रकट हुए. इसके बाद भगवान ब्रह्मा ने यहां भगवान शिव और विष्णु की दो मूर्तियां लगाईं. इसी वजह से इसे हरिहर नाम दिया गया था.

इसके साथ ही ये भी कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने गज-ग्राह युद्ध के बाद यहां धर्म और एकता के संदेश को फैलाने के लिए एक सभा का आयोजन किया था. धीरे-धीरे यही स्थान सदियों पुराना सोनपुर मेला बन गया, जहां धार्मिक श्रद्धा, लोक संस्कृति और व्यापार तीनों का संगम देखने को मिलता है. मेले में पशु-पक्षियों के साथ-साथ गाय, भैंस, घोड़े और हाथियों के अलग-अलग बाजार सजते हैं. इसके अलावा घरेलू सामान और ग्रामीण हस्तशिल्प से बनी चीजें भी यहां खूब बिकती हैं.

बिहार की सांस्कृतिक विरासत का भव्य उत्सव

विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला बिहार की सांस्कृतिक विरासत का एक भव्य उत्सव है, जहां व्यापार, कला और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. इस मेले को देखने के लिए सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि, विदेशों से भी सैलानी पहुंचते हैं. इस मेले के आकर्षण और पर्यटन को बढ़ाने के लिए पर्यटन विभाग की ओर से भी समय-समय पर प्रयास किए जाते हैं. पर्यटन विभाग यहां पहुंचने वाले सैलानियों के ठहरने और आराम करने के लिए कॉटेज का निर्माण कराती है, जहां हर तरह की फैसिलिटी मौजूद होती हैं.

अब कई तरह की एक्टिविटी की जाती हैं

मेले में आकर्षण बढ़ाने के लिए अब कई तरह की एक्टिविटी की जाती हैं, जैसे माइंड फेस्ट, क्विज, क्रॉसवर्ड प्रतियोगिता, मोटिवेशनल टॉक सीरीज, घुड़दौड़, डॉग शो और नौका दौड़ जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं. इन आयोजनों से लोगों की दिलचस्पी मेले की ओर बढ़ी है. हालांकि, अब पहले के मुकाबले मेले में भीड़ कम हो गई है. लेकिन, फिर भी इस मेले में आज भी कई ऐसे पशु पहुंचते हैं, जो आकर्षण का केंद्र बनते हैं.

इस दौरान यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए वन-वे ट्रैफिक, पार्किंग स्थल, वैकल्पिक रास्ता और पैदल यातायात के लिए खास व्यवस्था की गई है. मेला में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए महिला सहायता केंद्र और सूचना केंद्र को भी एक्टिव किया गया है. मेले में हर साल महंगे-महंगे पशुओं को लाया जाता है, जिनकी कीमत कई बार लोगों को हैरान कर देती है.

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