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पंजाब

प्रोफेसर (डॉक्टर) पुनीत गुप्ता हुए सम्मानित, हजारों साल पुरानी लिपि को किया डिकोड

नई दिल्ली: जैन प्राच्यविद्या शोध संसथान इंदौर द्वारा मण्डी हिमाचल प्रदेश के शोध कर्ता प्रोफेसर (डॉक्टर) पुनीत गुप्ता को पांच हज़ार साल पुरानी हड़प्पा लिपि को डिकोड करने के लिए नई दिल्ली में आयोजित पंच कल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव   में जैन मुनि श्री 108 प्रज्ञासागर जी द्वारा सम्मानित किया गया।

प्रोफेसर (डॉक्टर) पुनीत गुप्ता ने सभी 4000 हड़प्पा लिपि अभिलेखों को डिकोड कर लिया है। उनके इस अभूतपूर्व कार्य ने हड़प्पा की रिक्तता को किनारा करते हुए लिखित रूप में पुनः प्राप्त कर लिया है। पहली बार, सभी 700 से अधिक चिह्नों की लिपि को पूरी तरह से डिकोड किया गया है। इन सभी हड़प्पा चिन्हों का ध्वन्यात्मक मानों के साथ व्यवस्थित रूप से मानचित्रण के कार्य को पूरा किया गया। प्रोफेसर (डॉक्टर) के हड़प्पा यूनिकोड प्रस्ताव में एक मानकीकृत डिजिटल फ़ॉन्ट का विकास करना शामिल है, जिससे हड़प्पा की लिपि को यूनिकोड में एकीकृत किया जा सके।

प्रोफेसर (डॉक्टर) गुप्ता ने हड़प्पा सभ्यता के सभी 4000 मौजूदा अभिलेखों की पहली पूर्ण डिकोडिंग करते हुए, उनके अर्थ को निर्धारित करने में एक क्रांतिकारी सफलता की घोषणा की है। एक अभिनव डिजिटल रंग-कोडित प्रणाली का उपयोग करते हुए, डॉ. गुप्ता ने हड़प्पा सभ्यता के अक्षरों और शब्दों को अनुमानों या परिकल्पनाओं के आधार पर अक्षर-अक्षर और शब्द-अक्षर डिकोड किया है। डॉ. पुनीत गुप्ता (एम.बी.बी.एस., एम.डी., डी.एन.बी., डी.एम., एम.बी.ए.) द्वारा छोटे और बड़े अक्षरों वाले हड़प्पनअबुगिदा का पता पहली बार चिकित्सा विज्ञान के ध्वनिविज्ञान के माध्यम से चला।

एक प्रैक्टिशनर ऑन्कोलॉजिस्ट और ए.आई.एम.एस. फरीदाबाद के कैंसर चेयरमैन व एम.वी.एन. यूनिवर्सिटी के प्रो. (डॉ.) पुनीत गुप्ता के अनुसार, “हड़प्पा के समरूप चिह्न मानव के जबड़े और जीभ की गतिविधियों की जैविक समरूपता को प्रतिबिंबित करते हैं। हड़प्पा भाषा को बाय-कैमरल अबुगिडा सिस्टम (बा.अ.फ) सिस्टम कहा जाता है। हड़प्पा की भाषा के प्रत्येक विशिष्ट उच्चारण के लिए दो स्वतंत्र चिह्न (गैर-संयुक्त चिह्न) निर्दिष्ट किए गए हैं। यह बा.अ.फ इसकी व्याख्या और भारत के पांडुलिपि लेखन के लिए बहुभाषी कीबोर्ड की उत्पत्ति की गुप्त कुंजी प्रदान करता है। अब एक ही कंप्यूटर की-बोर्ड के द्वारा हड़प्पा की ब्राह्मी, अशोक-ब्राह्मी, कुषाण-ब्राह्मी, प्राकृत, पाली, गुप्ता-ब्राह्मी, संस्कृत, तमिल-ब्राह्मी, श्रीलंका-ब्राह्मी, हिंदी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और अतीत व वर्तमान की सभी विशेषकर मात्रा भारतीय लिपियों को लिखने में मदद कर सकता है।”

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