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बिहार

वोटर लिस्ट का विवाद: बिहार के डोमिसाइल मॉडल और बंगाल की SIR रिपोर्ट में क्या है अंतर? समझिए चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग ने बिहार में सबसे पहले मतदाता सूची के स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया पूरी की और उस मतदाता सूची पर चुनाव भी हुए. हालांकि बिहार में भी SIR को लेकर विवाद हुए थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद चरम पर पहुंच गया है. एक के बाद एक बीएलओ की मौत और ड्राफ्ट लिस्ट में मृतकों के नाम पर चुनाव आयोग को लेकर सवाल खड़े हुए. बिहार में चुनाव आयोग ने 13 मान्य डॉक्यूमेंट्स में से एक डोमिसाइल सर्टिफिकेट को मान्यता दी थी, लेकिन पश्चिम बंगाल डोमिसाइल सर्टिफिकेट पर चुनाव आयोग की ओर से ऐतराज जताया जा रहा है.

इसे लेकर यह सवाल उठ रहे हैं कि जब बिहार के SIR में डोमिसाइल सर्टिफिकेट मान्य था, तो फिर बंगाल में क्यों इस पर चुनाव आयोग आपत्ति जता रहा है? हालांकि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की ओर से कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग के इस फैसले खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया जाएगा.

पश्चिम बंगाल में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट का प्रकाशन हो गया है. ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पब्लिश होने के बाद, कमीशन ने उन बिना मैप वाले वोटर्स को हियरिंग का नोटिस भेजा है, जिनके नाम या रिश्तेदारों का नाम 2002 की वोटर लिस्ट में नहीं थे.

बंगाल में डोमिसाइल सर्टिफिकेट पर सवाल

कहा गया था कि संबंधित व्यक्ति को कमीशन द्वारा बताए गए 13 डॉक्यूमेंट्स में से कोई एक जमा करके खुद को भारतीय वोटर साबित करना होगा. कमीशन ने संबंधित राज्य द्वारा जारी परमानेंट एड्रेस या रेजिडेंस सर्टिफिकेट को 13 डॉक्यूमेंट्स में से एक माना और मतदाता बड़ी संख्या में रेजिडेंस सर्टिफिकेट या डोमिसाइल सर्टिफिकेट जमा दे रहे हैं.

ऐसे में राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय ने राज्य को लेटर लिखकर यह भी पूछा था कि यह सर्टिफिकेट किस ऑफिशियल लेवल पर जारी किया गया था. उस लेटर के जवाब में राज्य ने कहा था कि 1999 तक, डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने का अधिकार डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को दिया गया था. फिर यह सर्टिफिकेट ADM यानी एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट या SDO जारी करते थे, जो SIR के काम में ERO के तौर पर काम कर रहे हैं.

डोमिसाइल सर्टिफिकेट पर EC को क्यों ऐतराज?

राज्य से यह लेटर मिलने के बाद, CEO के ऑफिस ने दिल्ली में इलेक्शन कमीशन को लेटर भेजकर पूछा कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट एक्सेप्टेबल होगा या नहीं. सूत्रों के मुताबिक, उस लेटर को देखते हुए इलेक्शन कमीशन ने तय किया है कि इस मामले में डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्रूफ डॉक्यूमेंट के तौर पर एक्सेप्ट नहीं किया जाएगा, लेकिन कमीशन का तर्क है कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट का मतलब वह नहीं है जो राज्य की तरफ से जारी परमानेंट एड्रेस या रेजिडेंस सर्टिफिकेट होता है.

कमीशन द्वारा बताए गए 13 डॉक्यूमेंट के अलावा दूसरे डॉक्यूमेंट जमा करने पर रोक लगाई जा सकती है. खबर है कि जिन लोगों ने सुनवाई के दौरान पहले ही डोमिसाइल सर्टिफिकेट जमा कर दिया है, उन्हें फिर से सुनवाई के लिए बुलाया जा सकता है. SIR वोटर सुनवाई के दौरान कई वोटरों ने डोमिसाइल सर्टिफिकेट जमा किए थे. इसे जमा भी कर दिया गया है. शुरू में कमीशन ने कहा था कि DEO वेरिफाई करेंगे कि ये सभी सर्टिफिकेट एक्सेप्टेबल हैं या नहीं, लेकिन इलेक्शन कमीशन के सूत्रों के मुताबिक, अब उन सर्टिफिकेट को प्रूफ डॉक्यूमेंट के तौर पर एक्सेप्ट नहीं किया जाएगा.

बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चुनाव आयोग की नजर

पश्चिम बंगाल में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 58 लाख मतदाताओं के नाम काटे गये थे. चुनाव आयोग की ओर से जारी लिस्ट में कहा गया था कि ये वे मतदाता हैं, जिनका या तो मौत हो गई या अन्य जगह शिफ्ट कर गये हैं या वह नहीं मिल पा रहे हैं, लेकिन ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद चुनाव आयोग ने मैपिंग का काम शुरू किया है. यानि मतदाताओं की ओर से दिए गये विवरण की जांच शुरू की गयी. जांच के दौरान मतदाताओं द्वारा दिए गए सूचना में गड़बड़ी पाई गई और चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेज रहा है.

इस बीच, बीजेपी ने आरोप लगाया था कि राज्य में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं, जिन्हें टीएमसी की ओर से प्रश्रय मिलता है. बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि करीब एक करोड़ घुसपैठियों को नाम कटेंगे, लेकिन 58 लाख नाम कटने के बाद बीजेपी नेता के दावे पर सवाल उठ रहे थे. तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी और सुवेंदु अधिकारी पर तंज कसा. उसके बाद चुनाव आयोग ने जांच की प्रक्रिया तेज कर दी और प्रमाणपत्र की जांच की जाने लगी.

SIR शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में बने सर्टिफेकेट

इस बीच, कई ऐसे लोग हैं, जिनके पास डॉक्यूमेंट नहीं हैं, ममता बनर्जी ने आदेश दिया कि ऐसे लोगों को डॉक्यूमेंट बनाया जाए. कोलकाता नगर निगम सहित विभिन्न नगरपालिकाओं में लाइन लग गयी और बड़ी संख्या में डोमिसाइल सर्टिफिकेट बनाए गए, हालांकि डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने से पहले पुलिस वैरिफिकेशन की जरूरत होती है, लेकिन डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किए गये.

राज्य सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट के लिए एलिजिबिलिटी के लिए राज्य में कम से कम 15 साल का रेजिडेंस होना जरूरी है. एप्लिकेंट्स को इस समय के दौरान अपने रेजिडेंस को साबित करने वाले डॉक्यूमेंट्स जमा करने होंगे, जिसमें उन स्कूलों और कॉलेजों की डिटेल्स शामिल होंगी जिनमें वे पढ़े थे, और पिछले 15 सालों के दौरान रहने की सभी जगहों के पते शामिल होंगे, लेकिन आरोप है कि इसमें लापरवाही बरती गई. इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में मुस्लिम जातियों को ओबीसी में शामिल कर लिया गया है. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने एक सूची को रद्द करने का आदेश दिया था.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं कि चुनाव आयोग ने SIR में जल्दबाजी की है. इसे लेकर राज्य के लोगों में आतंक हैं. लोगों के मन में नागरिकता खोने की आशंका है, लेकिन इसके साथ ही जिस तरह से राज्य में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए के आधार कार्ड से लेकर वोटर कार्ड बनाए गए हैं. उससे यह प्रक्रिया जटिल हो गयी है. चुनाव आयोग के लिए इतने कम समय में उनकी पहचान करना आसान नहीं है.

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