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Supreme Court on Sabarimala: सबरीमाला मंदिर मामले में SC की सख्त टिप्पणी, वकील की दलीलों पर कोर्ट ने जताई नाराजगी

केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले की सुनवाई से इतर दलीलें देने के लिए एक वकील को फटकार लगाई है. दरअसल, सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी. इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं. सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान नौ जजों की बेंच ने एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से कई बार कहा कि वे अपनी दलीलें विचाराधीन मुद्दों तक ही सीमित रखें. अपनी दलीलों के दौरान, उपाध्याय ने तर्क दिया कि धर्म पंथ से श्रेष्ठ है, क्योंकि धर्म संघर्षों का स्रोत है. उन्होंने कहा कि पिछले 2000 वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों के कारण भारत 25 टुकड़ों में विभाजित हुआ और पिछले 200 वर्षों में भारत 7 देशों में विभाजित हुआ. हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, इस बात पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पीठ को अपने फैसले के परिणामों पर विचार करना होगा.

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से कई बार कहा, क्या अगले 25 वर्षों में हम चीन, सिंगापुर या जापान जैसे वैज्ञानिक रूप से एकीकृत देश बनेंगे, या पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश जैसे देश बन जाएंगे? उनके अनुसार, अनुच्छेद 25 और 26 अत्यंत प्रतिबंधात्मक तरीके से लिखे गए हैं और उन्होंने दावा किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म का प्रचार करने का अधिकार कुछ पश्चिमी संविधानों में भी मान्यता प्राप्त नहीं है, जिनसे भारतीय संविधान ने कुछ पहलुओं को अपनाया है.

बहस के दौरान उपाध्याय ने किया डॉ. अंबेडकर का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान उपाध्याय ने यह भी कहा कि संस्कृत में अंग्रेजी से अधिक अक्षर हैं और दावा किया कि डॉ. अंबेडकर ने इसे राजभाषा बनाने के लिए एक विधेयक पेश किया था. उन्होंने कहा कि अंग्रेजी में “संविधान” के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं है. उनके अनुसार, इसका कारण अंग्रेजी भाषा की सीमा है, जिसमें केवल 26 अक्षर हैं जबकि संस्कृत में 52 अक्षर हैं. उन्होंने आगे कहा कि इसलिए, जब हम अंग्रेजी में शब्दों का अनुवाद करते हैं, तो यह बहुत मुश्किल हो जाता है.” उन्होंने यह भी कहा कि धर्म के लिए भी अंग्रेजी में कोई सटीक शब्द नहीं है. उन्होंने बताया कि उन्होंने प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा में धर्म को शामिल करने के लिए एक जनहित याचिका दायर की है.

वकील की दलीलों पर जस्टिस महादेवन ने जताई नाराजगी

उन्होंने आगे कहा कि न्यायाधीशों को “महामहिम” कहकर संबोधित करने की परंपरा “पंच परमेश्वर” की परंपरा से आई है. फिर उन्होंने तर्क दिया कि सभी धर्म समान नहीं हैं. उन्होंने पीठ के समक्ष रामायण, विष्णु पुराण और भगवद् गीता की प्रतियां प्रदर्शित करते हुए कहा कि इनमें से किसी भी ग्रंथ में यह नहीं लिखा है कि इनका पालन न करने वाला व्यक्ति नरक में जाएगा. इस पर न्यायमूर्ति महादेवन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “आप हम सभी के द्वारा चर्चा किए जा रहे विषय से भटक रहे हैं. आपने कहा कि संस्कृत में 52 अक्षर हैं; इसी प्रकार, तमिल में 247 अक्षर हैं. इन सब विषयों में न जाएं. मुद्दे पर ही ध्यान केंद्रित करें. एक तरह से कोर्ट ने वकील को फटकार लगाई है.

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