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Al-Aqsa Mosque Controversy: यरुशलम की अल-अक्सा मस्जिद से जॉर्डन की भूमिका खत्म करने की साजिश? जानिए क्या है पूरी योजना

यरुशलम/वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति से जुड़ी एक बेहद विस्फोटक रिपोर्ट सामने आई है, जिसने पूरे अरब जगत में खलबली मचा दी है। ‘मिडिल ईस्ट आई’ (MEE) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजराइल मिलकर यरुशलम स्थित पवित्र अल-अक्सा मस्जिद से जॉर्डन की ऐतिहासिक संरक्षक भूमिका को समाप्त करने की एक गुप्त योजना पर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना का उद्देश्य मस्जिद की दशकों पुरानी व्यवस्था को बदलकर एक ऐसी नई व्यवस्था लागू करना है, जो सीधे तौर पर इजराइल के भू-राजनीतिक और धार्मिक हितों के अधिक करीब होगी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस विवादास्पद एजेंडे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और इजराइल में तैनात अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।

🕌 ‘मल्टी-फेथ सेंटर’ में बदलने की तैयारी: जॉर्डन समर्थित वक्फ की भूमिका खत्म कर यहूदियों को मिल सकते हैं प्रार्थना के समान अधिकार

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि नई योजना के तहत मस्जिद के प्रबंधन में जॉर्डन समर्थित ‘इस्लामिक वक्फ’ की भूमिका को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है। उसकी जगह इजराइल सरकार के सीधे सहयोग से एक नई संस्था बनाई जाएगी, जो अल-अक्सा मस्जिद को एक ‘मल्टी-फेथ सेंटर’ यानी कई धर्मों के साझा धार्मिक स्थल के रूप में दुनिया के सामने पेश करेगी। योजना के तहत यहूदियों को अब अल-अक्सा परिसर में समान अधिकार दिए जा सकते हैं और बड़े समूहों में यहूदी प्रार्थना करने की आधिकारिक अनुमति भी दी जा सकती है।

📝 इमामों की नियुक्ति और धार्मिक भाषणों पर इजराइल का नियंत्रण: अमेरिका द्वारा तैयार किया गया गोपनीय दस्तावेज

रिपोर्ट के दावे यहीं नहीं रुकते। इसमें कहा गया है कि इजराइल को मस्जिद के इमामों, धार्मिक उपदेशकों और अन्य शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति में भी सीधा दखल मिल सकता है। इतना ही नहीं, शुक्रवार के खुत्बों (धार्मिक भाषणों) की सामग्री को भी इजराइली प्रशासन की पूर्व-मंजूरी से जोड़ दिया जा सकता है। दो अमेरिकी अधिकारियों ने ‘मिडिल ईस्ट आई’ को बताया कि अमेरिका ने अल-अक्सा के भविष्य को लेकर एक गोपनीय दस्तावेज तैयार किया है। इसमें मस्जिद की विशिष्ट मुस्लिम पहचान को कम करके उसे मुस्लिम, ईसाई और यहूदियों के साझा पर्यटन और प्रार्थना स्थल के रूप में परिवर्तित करने का ब्लू-प्रिंट शामिल है।

🌏 खाड़ी देशों को निगरानी की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव: सऊदी अरब ने जॉर्डन का पक्ष लेते हुए योजना को किया खारिज

इस प्रस्ताव में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। एक पश्चिमी अधिकारी के अनुसार, योजना में बहरीन, मिस्र, मोरक्को और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों को बारी-बारी से मस्जिद परिसर की निगरानी (Supervision) सौंपने की बात कही गई है। इन देशों को इस अमेरिकी योजना की जानकारी दी जा चुकी है। हालांकि, सऊदी अरब इस प्रस्ताव के सख्त खिलाफ है। खाड़ी देशों के सूत्रों के अनुसार, सऊदी अरब का मानना है कि जॉर्डन की संरक्षक भूमिका इस पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। यदि जॉर्डन की भूमिका कमजोर हुई, तो पूरे मध्य पूर्व में तनाव की एक नई लहर दौड़ सकती है।

📜 1967 के युद्ध के बाद से स्थापित है मौजूदा व्यवस्था: जॉर्डन के हाशमी परिवार का 1924 से है संरक्षक का अधिकार

फिलहाल की स्थिति यह है कि अल-अक्सा दशकों से केवल और केवल मुस्लिम धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। 1967 के युद्ध के बाद जॉर्डन और इजराइल के बीच बनी सहमति के अनुसार, मस्जिद के अंदरूनी मामलों को इस्लामिक वक्फ संभालता है, जबकि बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी इजराइल के पास है। जॉर्डन का हाशमी शाही परिवार 1924 से ही यरुशलम के मुस्लिम और ईसाई स्थलों का संरक्षक रहा है, जिसे 1994 की जॉर्डन-इजराइल शांति संधि में भी मान्यता मिली थी। फिलिस्तीनी अधिकारियों का आरोप है कि इजराइल लगातार इस व्यवस्था को कमजोर कर रहा है। हालांकि, इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद एक अमेरिकी अधिकारी ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि व्हाइट हाउस जॉर्डन की भूमिका छीनने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है और यह रिपोर्ट पूरी तरह भ्रामक व गलत है।

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