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राज्यसभा से पास हुआ ‘खान और खनिज (विकास एवं नियमन) संशोधन विधेयक 2026’, खनिज भूमि पर केंद्रीय नियंत्रण का प्रावधान

नई दिल्ली: देश भर के खनिज क्षेत्रों में टैक्स, सेस और अन्य लेवी को लेकर राज्यों के बीच व्याप्त असमानता को समाप्त करने तथा देश में एक समान एवं स्थिर वित्तीय ढांचा निर्मित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को राज्यसभा से सफलतापूर्वक पास करा लिया है।

इस संशोधित विधेयक के माध्यम से खनिज-युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्तियों को मौजूदा केंद्रीय नियंत्रण के संवैधानिक दायरे में लाने का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

📊 खनन क्षेत्र में निश्चितता और स्थिरता लाना मुख्य ध्येय, राज्यों की अप्रत्याशित लेवी से मुक्त होगा उद्योग

इस नए विधायी संशोधन का प्राथमिक ध्येय भारत के खनन क्षेत्र में निश्चितता, स्थिरता और पूर्वानुमेयता (Certainty, Stability and Predictability) सुनिश्चित करना है।

केंद्र सरकार का मानना है कि भिन्न-भिन्न राज्यों द्वारा खनिजों के उत्पादन, डिस्पैच तथा खनिज-युक्त भूमि पर अलग-अलग दरों से मनमाने टैक्स, सेस व अतिरिक्त लेवी आरोपित किए जाने से खनन उद्योग पर अत्यधिक अप्रत्याशित वित्तीय बोझ पड़ता है। इससे कई बड़ी व महत्वपूर्ण खनन परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता (Commercial Viability) गंभीर रूप से प्रभावित होती है।

⚖️ विधेयक में नया ‘सेक्शन 9-D’ जोड़ने का प्रावधान, बिना केंद्र की पूर्व सहमति के राज्यों का टैक्स होगा अमान्य

इस नए कानून के अंतर्गत मूल अधिनियम में एक नया सेक्शन 9-D (Section 9-D) जोड़ने का वैधानिक प्रावधान किया गया है।

इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों अथवा खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी नाम से टैक्स, सेस अथवा लेवी तभी आरोपित व वसूल कर सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित शर्तों, सीमाओं और प्रतिबंधों के पूर्णतः अनुरूप हो। नए कानून के लागू होने से पूर्व यदि ऐसा कोई टैक्स या सेस राज्य सरकार द्वारा वसूल नहीं किया गया है, तो उसे प्रारंभ से ही शून्य व अमान्य माना जाएगा।

📜 1957 के मूल MMDR अधिनियम की धारा 13 में संशोधन, बैकडेट से टैक्स लगाने की प्रथा पर लगा पूर्ण विराम

हालाँकि, विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि जो राशि पहले ही राज्य सरकारों के खजाने में जमा हो चुकी है या वसूल की जा चुकी है, उसकी वापसी (Refund) की बाध्यता नहीं होगी।

इसके साथ ही Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 की धारा 13 में भी संशोधन का प्रस्ताव है। इसके जरिए केंद्र सरकार को यह तय करने हेतु नियम बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त होगी कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों पर किन शर्तों के अधीन कर लगा सकती हैं। सरकार का तर्क है कि पिछली तारीख से (Retrospective) टैक्स लगाने जैसी व्यवस्थाओं से निवेशकों का भरोसा टूटता है और कानूनी अनिश्चितता बढ़ती है।

🏭 छोटे और मध्यम खनन संचालकों को मिलेगी राहत, आम उपभोक्ताओं पर नहीं बढ़ेगा महंगाई का बोझ

खनिज संसाधन प्रकृति में सीमित हैं और देश के कुछ ही राज्यों में इनकी प्रचुरता है, ऐसे में लेवी की दरों में भारी अंतर असमान वित्तीय बोझ पैदा करता था।

सरकार के अनुसार, इस कानून का सीधा सकारात्मक प्रभाव विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के खनन संचालकों (MSME Mining Operators) पर पड़ेगा, जो अत्यधिक करों के कारण खदानें बंद करने पर मजबूर हो जाते थे। खनिजों पर अतिरिक्त टैक्स हटने से कच्चे माल की उत्पादन व परिवहन लागत नियंत्रित रहेगी, जिससे अंततः सीमेंट, स्टील और ऊर्जा आधारित वस्तुओं की कीमतें स्थिर रहेंगी और आम उपभोक्ता महंगाई की मार से बचेंगे।

🏛️ सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच के 2024 के फैसले पर असर, देश में बनेगा निवेश अनुकूल माहौल

गौरतलब है कि वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्यों को खनिज भूमि पर कर लगाने का अधिकार स्वीकार किया था।

किंतु संसद द्वारा इस संशोधन विधेयक के पारित हो जाने के बाद, केंद्रीय कानून के तहत नया विधिक ढांचा प्रभावी हो जाएगा। सरकार का दावा है कि इस एकीकृत व्यवस्था से देश के खनिज क्षेत्र में एक समान पारदर्शी वातावरण बनेगा, अंतरराष्ट्रीय व घरेलू निवेश को बढ़ावा मिलेगा और राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित विकास संभव हो सकेगा।

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